
ढाका । बांग्लादेश (Bangladesh) में 12 फरवरी, 2026 को होने वाले आम चुनावों (General elections) से ठीक पहले, अमेरिका (America) की विदेश नीति (foreign policy) में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका अब बांग्लादेश की सबसे प्रमुख इस्लामी पार्टी, जमात-ए-इस्लामी के साथ जुड़ने के संकेत दे रहा है। अमेरिका का यह कदम भारत के लिए गहरी चिंता का विषय है क्योंकि जमात-ए-इस्लामी का इतिहास पाकिस्तान समर्थक रहा है और यह भारत विरोधी मानी जाती रही है।
अमेरिकी राजनयिक का गुप्त बयान: जमात से दोस्ती करो
‘द वाशिंगटन पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1 दिसंबर, 2025 को ढाका में एक अमेरिकी राजनयिक ने बांग्लादेशी पत्रकारों के साथ ‘ऑफ-द-रिकॉर्ड’ बैठक की थी। इस बैठक की रिकॉर्डिंग वाशिंगटन पोस्ट को प्राप्त हुई है। राजनयिक ने स्वीकार किया कि बांग्लादेश अब इस्लामिक विचारधारा की ओर झुक गया है। उन्होंने पत्रकारों को प्रोत्साहित किया कि वे जमात की प्रभावशाली छात्र शाखा, ‘इस्लामी छात्र शिविर’ के सदस्यों को अपने टीवी कार्यक्रमों में बुलाएं।
राजनयिक ने कहा कि अमेरिका चाहता है कि जमात के नेता उनके दोस्त बनें। अमेरिका का मानना है कि जमात अब इतनी बड़ी राजनीतिक ताकत बन चुकी है कि उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, अमेरिकी दूतावास ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि यह एक नियमित बातचीत थी और अमेरिका किसी भी एक राजनीतिक दल का पक्ष नहीं लेता है।
जमात-ए-इस्लामी की बढ़ती लोकप्रियता: आंकड़े और सर्वेक्षण
अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने और उनके भारत निर्वासित होने के बाद, जमात-ए-इस्लामी ने खुद को एक नई ताकत के रूप में पेश किया है। कई सर्वे में यह बात सामने आई है कि मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार द्वारा कराए जा रहे फरवरी चुनावों में जमात अपने अब तक के सबसे अच्छे प्रदर्शन की ओर बढ़ रही है।
अमेरिका स्थित थिंक टैंक ‘इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट’ (IRI) के दिसंबर पोल के अनुसार, इसमें शामिल 53% लोगों ने जमात-ए-इस्लामी को पसंद किया है। यह पार्टी अब मुख्य दावेदार ‘बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी’ (BNP) को कड़ी टक्कर दे रही है। पिछले साल ढाका और अन्य विश्वविद्यालयों में हुए छात्र संघ चुनावों में जमात की छात्र शाखा ने बड़ी जीत हासिल की, जो इसकी जमीनी पकड़ को दर्शाता है।
अमेरिका की गाजर और छड़ी वाली नीति
अमेरिका जमात के साथ जुड़ना तो चाहता है, लेकिन उसने कट्टरपंथ को रोकने के लिए आर्थिक चेतावनी भी दी है। अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि अगर जमात सरकार में आती है और शरिया कानून लागू करती है या महिलाओं के काम करने पर पाबंदी लगाती है (जैसे काम के घंटे घटाना), तो अमेरिका तुरंत सख्त कार्रवाई करेगा। राजनयिक ने चेतावनी दी- हम अगले ही दिन 100% टैरिफ लगा देंगे। अगर कोई ऑर्डर नहीं मिलेंगे, तो बांग्लादेशी अर्थव्यवस्था नहीं बचेगी। गौरतलब है कि बांग्लादेश के कुल निर्यात का लगभग 20% अमेरिका को जाता है, जिसमें गारमेंट इंडस्ट्री प्रमुख है।
जमात का बदला हुआ रूप
लंबे समय तक प्रतिबंधित रहने और 1971 के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का साथ देने के कारण बदनाम रही जमात ने अब अपनी छवि बदलने की कोशिश की है। पार्टी अब भ्रष्टाचार विरोधी मुद्दों और सामाजिक कल्याण पर जोर दे रही है। हालांकि, पार्टी के भीतर और गठबंधन में वैचारिक मतभेद भी हैं। हाल ही में ‘इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश’ ने जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन से अलग होकर स्वतंत्र चुनाव लड़ने का फैसला किया है।
भारत के लिए चिंता का विषय
नई दिल्ली के लिए जमात का उदय और अमेरिका का उसे वैधता प्रदान करना दोहरी मुसीबत है। भारत जमात को संदेह की नजर से देखता है क्योंकि उसने 1971 में बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था और उसके पाकिस्तान के साथ गहरे वैचारिक संबंध माने जाते हैं। अटलांटिक काउंसिल के माइकल कुगलमैन के अनुसार, अमेरिका का यह कदम भारत और अमेरिका के बीच पहले से तनावपूर्ण संबंधों में और खटास पैदा कर सकता है। भारत का सबसे बड़ा डर हमेशा से बांग्लादेश में जमात का बढ़ता प्रभाव रहा है।
शेख हसीना के हटने के बाद से बांग्लादेश में हिंदुओं और अवामी लीग के समर्थकों पर हमलों की खबरें बढ़ी हैं। पूर्व विदेश मंत्री ए.के. अब्दुल मोमेन ने आरोप लगाया है कि यूनुस प्रशासन के तहत प्रोपगेंडा, नफरत और अमानवीयकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है।
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