
उज्जैन। लगातार एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में ट्रांसफर वाली नौकरी में रहने वाले लोगों की सुविधा को देखते हुए केंद्र सरकार ने वाहनों में भारत सीरीज (बीएच) की शुरुआत की थी लेकिन मध्य प्रदेश में वाहन मालिक इसमें खुद को फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं। प्रदेश में केंद्रीय परिवहन पोर्टल ‘वाहन’ पर बीएच सीरीज शुरू होने के पांच साल बाद भी वाहन को बेचने पर ट्रांसफर सहित किसी भी अन्य काम के लिए कोई विकल्प ही मौजूद नहीं हैं।
उल्लेखनीय है कि सितंबर 2021 में भारत सरकार ने पहली बार परिवहन नियमों में बदलाव करते हुए बीएच सीरिज की शुरुआत की थी। यह उन लोगों के लिए थी, जो केंद्र सरकार के किसी विभाग में कार्यरत हैं या ऐसी निजी कंपनी में काम करते हैं, जिसका कारोबार चार या उससे अधिक राज्यों में है। इसका मकसद ऐसी नौकरियों में काम करने वाले कर्मचारियों के बार-बार ट्रांसफर होने पर हर बार वाहन को नए राज्य में ट्रांसफर कराने की परेशानी से बचाना था। इसके साथ ही ऐसे कर्मचारियों को टैक्स में भी राहत का प्रावधान किया गया था। बीएच सीरिज के तहत वाहन रजिस्टर्ड कराने पर वाहन मालिक को हर दो साल में वाहन की कीमत का 2.5 प्रतिशत टैक्स जमा करना होता है। यानी एक साथ पूरे 15 साल का टैक्स जमा करने की जरूरत नहीं होती। यह व्यवस्था इसलिए की गई थी, ताकि वाहन मालिक का एक राज्य से दूसरे राज्य में ट्रांसफर होने पर अगली अवधि का टैक्स नए राज्य में जमा किया जा सके। ट्रांसफर वाली नौकरी में रहने वाले लोगों की सुविधा के लिए शुरू की गई यह व्यवस्था अब लोगों के लिए परेशानी बन गई है। मध्य प्रदेश में इसकी शुरुआत के करीब पांच साल बाद भी ऐसे वाहनों को बेचने का विकल्प सिस्टम में उपलब्ध नहीं है। बीएच सीरिज वाले वाहन मालिक न तो किसी अन्य पात्र व्यक्ति को और न ही किसी सामान्य व्यक्ति को वाहन बेच पा रहे हैं। इसके साथ ही वाहन को सामान्य कैटेगरी में शिफ्ट करने और फाइनेंस चढ़ाने का विकल्प भी उपलब्ध नहीं हो रहा है। प्रदेश में ऐसे वाहनों की संख्या 30 हजार से भी ज्यादा है और इनमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है। उज्जैन में भी सैकड़ों वाहन चल रहे हैं।
नियमों में कई खामियाँ भी
विशेषज्ञों के मुताबिक बीएच सीरिज को लेकर शासन द्वारा तैयार किए गए नियमों में कई खामियाँ हैं। जैसे अगर कोई बीएच सीरिज का पात्र व्यक्ति अपना वाहन किसी सामान्य व्यक्ति को बेचना चाहता है तो उसका नंबर सरेंडर होगा और नए वाहन मालिक के नाम पर वाहन नए नंबर के साथ रजिस्टर्ड होगा। इस स्थिति में नए वाहन मालिक को पुराना वाहन लेने के बाद भी पूरे 15 साल का टैक्स जमा करना होगा, जो पूरी तरह उचित नहीं है। ऐसे मामलों में जितने साल का टैक्स पहले ही जमा किया जा चुका है, उसे घटाकर बाकी बचे वर्षों का टैक्स लिया जाना चाहिए। हालांकि, इस खामी के बावजूद प्रदेश में वाहन नहीं बिक पा रहे हैं, क्योंकि ट्रांसफर का विकल्प ही बंद है।
टैक्स वसूली में भी हो रही मुश्किल
बीएच सीरिज में वाहन रजिस्ट्रेशन के वक्त दो साल का ही टैक्स लिया जाता है। इसके बाद हर दो साल में वाहन मालिक को खुद टैक्स जमा करना होता है। इससे परिवहन विभाग को एकमुश्त टैक्स नहीं मिलता और अक्सर दो साल बाद वाहन मालिक टैक्स भी जमा नहीं करता। ऐसी स्थिति में परिवहन विभाग को उस वाहन और मालिक को तलाशना पड़ता है। अगर वाहन मालिक राज्य छोड़ चुका है तो टैक्स की वसूली लगभग असंभव हो जाती है। पिछले कुछ समय से इंदौर आरटीओ की टीम ऐसे वाहनों से टैक्स वसूली को लेकर परेशान हो रही है। वहीं वाहन मालिक द्वारा दो साल बाद समय पर टैक्स जमा न करने पर प्रतिदिन 100 रुपए का जुर्माना लगाया जाता है। यानी अगर किसी वाहन मालिक ने एक साल तक टैक्स नहीं भरा तो उसे बकाया टैक्स के साथ 36 हजार रुपए से ज्यादा का जुर्माना भी भरना होगा।
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