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भारत से आबादी में पिछड़ने के बाद चीन पर दोहरी मार, जन्म दर घटी, इकोनॉमी भी खतरे में

January 22, 2026

बीजिंग । चीन (China) दशकों तक दुनिया की सबसे बड़ी आबादी (population) वाला देश होने के लिए जाना जाता था। लेकिन अब भारत का यह पड़ोसी देश एक ऐतिहासिक जनसांख्यिकीय बदलाव (demographic change) से गुजर रहा है। 2023 में भारत से ‘सबसे अधिक आबादी वाले देश’ का ताज छिनने के बाद, 2025 के आंकड़े चीन के लिए और भी चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं।

माओत्से तुंग के समय में 1960 के दशक के महान अकाल के बाद पहली बार चीन की जनसंख्या में इतनी तेज गिरावट देखी गई है। यह गिरावट ‘वन-चाइल्ड पॉलिसी’ (एक बच्चे की नीति) खत्म होने के बावजूद जारी है।

चीन की जनसंख्या के साथ क्या हो रहा है?
नेशनल स्टैटिस्टिक्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, जन्म दर में कमी और मृत्यु दर में वृद्धि के कारण चीन की जनसंख्या में भारी गिरावट आई है।

जनसंख्या में कमी: 2025 में चीन की कुल जनसंख्या में 3.39 मिलियन (33.9 लाख) की कमी आई है।

जन्म दर का रिकॉर्ड निचला स्तर: 2025 में केवल 7.93 मिलियन (79.3 लाख) बच्चों का जन्म हुआ। यह 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना के बाद से अब तक का सबसे निचला स्तर है।

प्रजनन दर: जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए प्रजनन दर 2.1 होनी चाहिए, लेकिन 2020 में चीन की दर गिरकर 1.3 रह गई थी।


  • लैंगिक असंतुलन: चीन में बेटों की चाहत के कारण पिछले दशकों में कन्या भ्रूण हत्या के मामले सामने आए, जिससे लैंगिक अनुपात बिगड़ गया। हालांकि, हाल के वर्षों में यह अनुपात स्थिर होकर प्रति 100 लड़कियों पर 104 लड़कों पर आ गया है, लेकिन आज भी बच्चे पैदा करने की उम्र वाली महिलाओं की भारी कमी है।

    अर्थव्यवस्था और समाज पर इसका क्या असर पड़ेगा?
    जनसंख्या में गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं है; इसके गंभीर आर्थिक परिणाम हैं जो चीन के महाशक्ति बनने के सपने को प्रभावित कर सकते हैं।

    घटता वर्कफोर्स: काम करने वाली आबादी (16 से 59 वर्ष) लगातार कम हो रही है। 2025 में यह कुल आबादी का 60.6% रह गई, जो एक दशक पहले 70% से अधिक थी।

    बुजुर्गों की बढ़ती संख्या: अनुमान है कि 2034 तक चीन की 30% आबादी 60 वर्ष या उससे अधिक की होगी।

    आर्थिक विकास पर चोट: श्रमिकों की कमी से मजदूरी बढ़ेगी, जिससे चीन में बने सामान महंगे हो जाएंगे। यह चीन की अर्थव्यवस्था के अमेरिका से आगे निकलने की संभावना को कम कर सकता है।

    पेंशन और हाउसिंग संकट:
    पेंशन: कम युवा कर्मचारी काम कर रहे हैं, जिसका मतलब है कि रिटायर होने वाले बुजुर्गों की पेंशन के लिए सरकार के पास कम पैसा आ रहा है।

    हाउसिंग: कम लोग परिवार शुरू कर रहे हैं, जिससे घरों की मांग घट रही है। इसका सीधा असर चीन के विशाल कंस्ट्रक्शन और आयरन ओर (लौह अयस्क) उद्योग पर पड़ेगा।

    सरकार इसे ठीक करने के लिए क्या कर रही है?
    बीजिंग ने इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन अभी तक परिणाम बहुत उत्साहजनक नहीं रहे हैं।

    नीतियों में बदलाव: 2016 में ‘वन-चाइल्ड पॉलिसी’ खत्म कर दो बच्चों की अनुमति दी गई। 2021 में इसे बढ़ाकर तीन बच्चों तक कर दिया गया।

    आर्थिक मदद: सरकार ने बच्चों की देखभाल के लिए सब्सिडी देना शुरू किया है। 1 जनवरी, 2025 के बाद पैदा हुए हर बच्चे के लिए माता-पिता को लगभग 500 डॉलर (करीब 41,000 रुपये) प्रति वर्ष दिए जा रहे हैं जब तक बच्चा तीन साल का नहीं हो जाता।

    रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाना: चीन ने अगले 15 वर्षों में रिटायरमेंट की उम्र को धीरे-धीरे 5 साल तक बढ़ाने की योजना बनाई है। वर्तमान में पुरुषों के लिए यह 60 वर्ष और वाइट-कॉलर महिलाओं के लिए 55 वर्ष है। इस फैसले से जनता में काफी नाराजगी भी है।

    लागत कम करना: शिक्षा की लागत कम करने के लिए सरकार ने ट्यूशन इंडस्ट्री पर नकेल कसी है और गर्भपात को कम करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं।

    समस्या की जड़: ‘वन-चाइल्ड पॉलिसी’ क्या थी?
    1979 में, चीन भोजन और आवास की कमी से जूझ रहा था। तब नेता देंग शियाओपिंग ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए ‘वन-चाइल्ड पॉलिसी’ लागू की थी।

    इस नीति के तहत अधिकांश जोड़ों को केवल एक बच्चा पैदा करने की अनुमति थी। इसे सख्ती से लागू किया गया- ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार, महिलाओं को गर्भपात के लिए मजबूर किया गया। नियम तोड़ने पर पैदा हुए बच्चों को ‘हूकोउ’ (hukou यानी सरकारी पंजीकरण) नहीं दिया जाता था, जिससे वे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाते थे।

    क्या यह स्थिति सुधरेगी?
    चीन के सामने रास्ता कठिन है। 2016 में जब दो बच्चों की अनुमति दी गई थी, तो जन्म दर में मामूली उछाल आया था, लेकिन उसके बाद से हर साल गिरावट जारी है (2024 को छोड़कर)। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों का अनुभव बताता है कि एक बार जब समाज की सोच बदल जाती है और जीवनयापन की लागत बढ़ जाती है, तो नकद प्रोत्साहन या सब्सिडी से जन्म दर को बढ़ाना लगभग असंभव हो जाता है। चीन अब ‘बूढ़े होने से पहले अमीर बनने’ की दौड़ में पिछड़ता हुआ दिखाई दे रहा है।

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