नई दिल्ली। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र (Indo-Pacific region) में चीन (China) की सैन्य गतिविधियों को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने अपनी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया है। इस घटनाक्रम पर भारत और ऑस्ट्रेलिया ने क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को लेकर चिंता व्यक्त की है।
ऑस्ट्रेलिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़ के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक के दौरान इस विषय पर चर्चा हुई। बैठक के बाद भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि दोनों नेताओं ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया।
रक्षा विशेषज्ञों और सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने JL-2 (जूलांग-2) पनडुब्बी से प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) का परीक्षण किया। बताया गया कि मिसाइल ने लगभग 7,300 किलोमीटर की दूरी तय की और उसका परीक्षण पेलोड दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में सोलोमन द्वीपों के निकट समुद्री क्षेत्र में गिरा।
हालांकि चीन की ओर से इस परीक्षण के सभी तकनीकी विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं और स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि सीमित है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पनडुब्बी से दागी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें किसी भी देश की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता (Nuclear Deterrence) का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। समुद्र में तैनात पनडुब्बियों का पता लगाना अपेक्षाकृत कठिन होता है, जिससे ऐसी क्षमता को रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
अमेरिकी रक्षा विभाग की पूर्व रिपोर्टों के अनुसार, चीन के पास कई परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां हैं, जो लंबी दूरी की परमाणु-सक्षम मिसाइलें ले जाने में सक्षम हैं।
इस परीक्षण के बाद ऑस्ट्रेलिया, जापान और अन्य इंडो-पैसिफिक देशों ने क्षेत्रीय सुरक्षा पर चिंता जताई है। ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग ने कहा कि ऐसी सैन्य गतिविधियां क्षेत्र में तनाव बढ़ा सकती हैं। वहीं जापान ने भी इस परीक्षण को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की और पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर दिया।
रक्षा मामलों के विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह के परीक्षण चीन की समुद्र-आधारित परमाणु क्षमता को प्रदर्शित करते हैं। उनका मानना है कि इससे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है तथा क्षेत्रीय देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को और मजबूती मिलने की संभावना है।
भारत लगातार यह रुख दोहराता रहा है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सभी देशों को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करते हुए शांति, स्थिरता, नौवहन की स्वतंत्रता और नियम-आधारित व्यवस्था को बनाए रखना चाहिए।
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