
नई दिल्ली: जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी (Maulana Arshad Madani) ने आज एक बयान जारी कर कांग्रेस (Congress) की सांप्रदायिकता (Communalism) के खिलाफ नीति पर गंभीर सवाल (Serious Questions) उठाए हैं. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने आजादी के बाद धर्म (Dharma) के आधार पर नफरत की राजनीति (Politics) के खिलाफ लचकदार (नरम) रवैया अपनाया, जिससे सांप्रदायिक शक्तियां मजबूत हुईं और देश को बड़ा नुकसान पहुंचा है.
मौलाना मदनी ने कहा कि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद अगर सांप्रदायिकता का सिर सख्ती से कुचल दिया जाता, तो देश को तबाही और बर्बादी से बचाया जा सकता था. गांधी जी की हत्या सांप्रदायिक शक्तियों के हाथों हुई थी और उस समय कांग्रेस में कुछ बड़े नेता भी गांधी जी के खिलाफ हो गए थे. उन्होंने गांधी जी के उपवास और मुस्लिम विरोधी दंगों को रोकने के प्रयासों का जिक्र किया.
मौलाना मदनी ने आरोप लगाया कि आजादी के बाद कांग्रेस ने सांप्रदायिक शक्तियों के साथ नर्मी बरती, उनके खिलाफ संविधान के अनुसार कड़ी कानूनी कार्रवाई नहीं की. इससे सांप्रदायिक ताकतें फलने-फूलने लगीं. मौलाना मदनी ने याद दिलाया कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने आजादी से पहले ही कांग्रेस से लिखित आश्वासन लिया था कि आजाद भारत का संविधान सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) होगा और अल्पसंख्यकों को पूरी तरह से धार्मिक आजादी मिलेगी.
लेकिन विभाजन के बाद कुछ कांग्रेस नेता भी कहने लगे कि मुसलमानों के लिए अलग देश (पाकिस्तान) बन चुका है, तो अब संविधान सेक्युलर नहीं होना चाहिए. लेकिन जमीयत के नेतृत्व ने कांग्रेस का हाथ पकड़कर वादा पूरा करवाया और सेक्युलर संविधान बना. फिर भी, सांप्रदायिकता की जड़ें अंदर ही अंदर गहरी होती गईं.
मौलाना मदनी ने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में केंद्र और सभी राज्यों में उनकी सरकार थी. अगर वे चाहते तो सांप्रदायिकता के खिलाफ कड़े कानून बना सकते थे, लेकिन लचकदार नीति के कारण ऐसा नहीं हुआ. जमीयत ने लगातार मांग की कि इस जुनून को रोका जाए, मगर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया. उन्होंने कहा कि अगर 77 साल पहले कांग्रेस ने सांप्रदायिकता के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया होता, तो आज वे सत्ता से बाहर नहीं होतीं और देश बर्बादी के कगार पर नहीं पहुंचता. आज संविधान और लोकतंत्र के चरित्र को खुले तौर पर मिटाने की कोशिश हो रही है, जो हमारे पूर्वजों ने कभी सोचा भी नहीं था.
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