
जबलपुर। मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के मढ़ोताल ग्रामीण संभाग में इन दिनों एक कथित चेकिंग विवाद चर्चा का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे संदेशों में सहायक अभियंता मुकेश विश्वकर्मा पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि उन्होंने बरगी क्षेत्र में विद्युत चोरी पकडऩे गई टीम को रोका और सूचना दबाने के लिए वर्किंग ग्रुप से कर्मचारियों को हटाया। हालांकि, यदि इन आरोपों का तार्किक विश्लेषण किया जाए, तो मामले की सच्चाई कुछ और ही नजर आती है। ये शिकायत केवल सोशल मीडिया पर ही दौड़ रही है। ना कोई प्रमाण दिए गये हैं ना ही शिकायतकर्ता ही सामने आ रहे हैं। इधर,विश्वकर्मा पर लगाए गए आरोपों में सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस समय बरगी के सुकरी नदी क्षेत्र में चेकिंग की बात कही जा रही है, वहां सहायक अभियंता स्वयं मौजूद ही नहीं थे।
क्या आरोप लगाए गए
एई मुकेश विश्वकर्मा पर आरोप है कि उन्होंने बरगी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर चल रही बिजली चोरी और अवैध कृषि पंपों के खिलाफ कार्रवाई को रोकने का प्रयास किया। आरोप है कि जब फील्ड स्टाफ ने च्छ्वड्डड्ढड्डद्यश्चह्वह्म् ह्र&रू ङ्खशह्म्द्मद्बठ्ठद्द त्रह्म्शह्वश्चज् में घपले की जानकारी साझा करनी चाही, तो एई ने उन्हें ग्रुप से हटा दिया ताकि सच्चाई उच्च अधिकारियों तक न पहुंचे। शिकायत में कहा गया है कि लाइनमैन द्वारा चेकिंग टीम को सहयोग न करना और मौके से भागना, उच्चाधिकारियों की मिलीभगत की ओर इशारा करता है। उन पर पद का दुरुपयोग कर अवैध सप्लाई को बढ़ावा देने और कंपनी को आर्थिक नुकसान पहुँचाने का आरोप लगाया गया है।
कई पेंच हैं इस प्रकरण में
विभागीय सूत्रों के अनुसार, किसी भी फील्ड ऑपरेशन में अगर वरिष्ठ अधिकारी मौके पर उपस्थित न हो, तो उसे प्रत्यक्ष रूप से बाधा डालने का दोषी मानना तर्कसंगत नहीं है। यह भी कहा जा रहा है कि फील्ड पर तैनात लाइनमैन या अन्य कर्मचारियों की गतिविधियों के लिए सीधे तौर पर कार्यालय में बैठे अधिकारी को जिम्मेदार ठहराना प्रशासनिक प्रक्रिया के विपरीत है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह केवल एक अधिकारी की छवि धूमिल करने का प्रयास है। इस पूरे प्रकरण में एक और संदिग्ध पहलू यह है कि जहां गंभीर भ्रष्टाचार और गठजोड़ की बातें की जा रही हैं, वहां आधिकारिक तौर पर शिकायतकर्ता का नाम स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ रहा है। यह पूरा मामला फिलहाल केवल सोशल मीडिया पर घूम रहे संदेशों और अपुष्ट जानकारियों तक सीमित है। बिजली कंपनी के प्रबंधन ने भी अब तक इस विषय पर कोई आधिकारिक बयान या पुष्टि नहीं की है। बिना किसी ठोस साक्ष्य या हस्ताक्षरित शिकायत के, केवल डिजिटल ग्रुप से हटाए जाने को घोटाला छिपाने से जोडऩा जल्दबाजी और अतार्किक लगता है। कंपनी के भीतर वर्किंग ग्रुप का प्रबंधन एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसे भ्रष्टाचार से जोड़कर देखना संदेह पैदा करता है। इस बारे में अधिकारी कुछ भी कहने से बच रहे हैं।
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