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आज संसद में पेश होगा देश का बजट.. ट्रंप टैरिफ और वैश्विक तनाव के बीच आर्थिक रफ्तार बनाए रखने की चुनौती

February 01, 2026

नई दिल्ली। केंद्र सरकार (Central Government) अगला केंद्रीय बजट (Union Budget) ऐसे समय पेश कर रही है जब देश की अर्थव्यवस्था (Economy) को बाहरी दबावों और आंतरिक सीमाओं दोनों का सामना करना पड़ रहा है। बढ़ते वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिका द्वारा कुछ भारतीय उत्पादों पर लगाए गए भारी शुल्क और राजस्व पर पड़ते दबाव के बीच सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह आर्थिक रफ्तार को बनाए रखते हुए राजकोषीय संतुलन भी साधे।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) द्वारा आज रविवार को पेश किया जाने वाला यह बजट ऐसे वित्तीय वर्ष के लिए होगा, जिसमें कर कटौतियों के चलते सरकारी खजाने पर करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने का अनुमान है। ऐसे में सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में सरकारी खर्च को सीमित रखना सरकार की मजबूरी बन गया है।


  • सरकार ने मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद का लगभग चार दशमलव चार प्रतिशत तय किया है। इसका साफ संकेत है कि सरकार अब बड़े पैमाने पर लोकलुभावन खर्च के बजाय संरचनात्मक सुधारों के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहती है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि देश दीर्घकालिक समस्याओं से निकलकर दीर्घकालिक समाधानों की ओर बढ़ रहा है। उनके अनुसार ऐसे समाधान न सिर्फ स्थिरता लाते हैं बल्कि वैश्विक स्तर पर भरोसा भी पैदा करते हैं। सरकार का मानना है कि आने वाले पच्चीस साल भारत के लिए निर्णायक होंगे, जिनमें देश को विकसित राष्ट्र बनाने की नींव रखी जानी है।

    सुधारों पर लगातार जोर
    बीते कुछ महीनों में केंद्र सरकार ने निजी निवेश और घरेलू मांग को प्रोत्साहित करने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं। इसमें उपभोग और आय से जुड़े करों में राहत, श्रम कानूनों में बदलाव और परमाणु ऊर्जा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को धीरे-धीरे खोलने की पहल शामिल है। माना जा रहा है कि बजट में इन सुधारों को और आगे बढ़ाने की घोषणा हो सकती है। सरकार का फोकस ऐसी नीतियां बनाने पर है, जो निजी क्षेत्र को निवेश के लिए प्रोत्साहित करें और रोजगार सृजन को गति दें। सीधे सरकारी खर्च की गुंजाइश सीमित होने के कारण नीति सुधार ही अर्थव्यवस्था को सहारा देने का मुख्य हथियार बनकर उभर रहे हैं।

    विनिर्माण और रक्षा क्षेत्र में नई कोशिश
    मोदी सरकार एक बार फिर विनिर्माण क्षेत्र को अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बनाने की कोशिश में जुटी है। इससे पहले भी दो बार इस दिशा में प्रयास किए गए, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके। अब तीसरी बड़ी पहल की तैयारी है, जिसमें नियमों को सरल बनाकर और प्रोत्साहन देकर उद्योगों को आकर्षित करने पर जोर होगा। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में निवेश नियमों को आसान किए जाने की संभावना है। सरकार चाहती है कि भारत न सिर्फ अपनी जरूरतें खुद पूरी करे, बल्कि रक्षा उपकरणों का बड़ा निर्यातक भी बने।

    उधारी बढ़ेगी, लेकिन नियंत्रण में
    आने वाले वित्तीय वर्ष में केंद्र सरकार की सकल उधारी सोलह लाख करोड़ रुपये से सोलह लाख अस्सी हजार करोड़ रुपये के बीच रहने का अनुमान है, जो मौजूदा वर्ष के मुकाबले अधिक है। हालांकि सरकार यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि उधारी बढ़ने के बावजूद वित्तीय अनुशासन से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

    वैश्विक मोर्चे पर संतुलन की कोशिश
    अमेरिका द्वारा कुछ भारतीय उत्पादों पर लगाए गए भारी शुल्क का असर कम करने के लिए भारत वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है। इसी क्रम में यूरोपीय संघ के साथ ऐतिहासिक व्यापार समझौते जैसे कदम अहम माने जा रहे हैं। सरकार का मानना है कि विविध बाजारों से जुड़कर निर्यात को स्थिर रखा जा सकता है। कुल मिलाकर यह बजट बड़े ऐलानों से ज्यादा नीति संकेतों और सुधारों की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है। सीमित खर्च क्षमता के बीच सरकार की नजर इस बात पर रहेगी कि कैसे भरोसे, स्थिरता और सुधारों के जरिए भारतीय अर्थव्यवस्था को अनिश्चित वैश्विक हालात से सुरक्षित रखा जाए।

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