
नई दिल्ली । फ्रांस (France) अब छठी पीढ़ी (Sixth Generation) का अत्याधुनिक लड़ाकू विमान (Fighter Aircraft) विकसित करने की तैयारी में है। जर्मनी और स्पेन के साथ मिलकर आगे बढ़ाई जा रही भविष्य के लड़ाकू विमान की संयुक्त परियोजना (Joint Project) में मतभेद सामने आने के बाद फ्रांस ने इसे अपने स्तर पर आगे बढ़ाने का फैसला किया है। इस नए विमान का उद्देश्य मौजूदा राफेल (Rafale) से आगे की तकनीकी क्षमताओं वाला लड़ाकू विमान तैयार करना है। इसके विकास के लिए 2040 के शुरुआती वर्षों का लक्ष्य रखा गया है।
फ्रांस की सशस्त्र बल मंत्री कैथरीन वौत्रिन ने संसदीय सुनवाई के दौरान इस दिशा में लिए गए फैसले की पुष्टि की। उनके अनुसार, जुलाई 2026 में परियोजना को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया था। इसका अर्थ है कि फ्रांस अब विमान के विकास और उससे जुड़ी प्रमुख तकनीकों पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है।
इस परियोजना को अब ‘अवियन डी कॉम्बैट डू फ्यूचर’ यानी एसीएफ नाम दिया गया है। इसका अर्थ भविष्य का लड़ाकू विमान है। पहले यह जर्मनी, फ्रांस और स्पेन की संयुक्त पहल फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (एफसीएएस) का हिस्सा थी। साझेदार देशों के बीच मतभेदों के कारण फ्रांस ने अब अपने लिए अलग रास्ता चुना है।
फ्रांस की योजना मौजूदा राफेल एफ5 संस्करण से जुड़ी तकनीकों और पहले की संयुक्त परियोजना में विकसित किए गए तकनीकी कार्यों का उपयोग करने की है। वर्ष 2027 में नए विमान के प्रदर्शन मॉडल यानी डेमोंस्ट्रेटर पर काम शुरू करने की तैयारी है। यह मॉडल नई तकनीकों की क्षमता परखने और भविष्य के विमान की संरचना विकसित करने में मदद करेगा।
नया लड़ाकू विमान केवल एक आधुनिक हवाई प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं होगा। इसके साथ ड्रोन, निर्देशित हथियार और कॉम्बैट क्लाउड जैसी प्रणालियों पर भी काम जारी रखने की योजना है। कॉम्बैट क्लाउड ऐसी डिजिटल व्यवस्था है, जिसके जरिए विमान, मानवरहित प्रणालियां और अन्य सैन्य संसाधन सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य युद्ध के दौरान अलग-अलग प्रणालियों के बीच तालमेल बेहतर बनाना है।
फ्रांस के लिए इस परियोजना को अकेले आगे बढ़ाने का एक प्रमुख कारण तकनीकी और औद्योगिक नियंत्रण बनाए रखना है। संयुक्त परियोजनाओं में अलग-अलग देशों की जरूरतें, तकनीकी प्राथमिकताएं और औद्योगिक हित निर्णय लेने की प्रक्रिया को जटिल बना सकते हैं। स्वतंत्र रूप से काम करने से फ्रांस को विकास की दिशा और उत्पादन संबंधी फैसलों पर अधिक अधिकार मिल सकता है।
हालांकि, इस तरह की परियोजना को अकेले पूरा करना आर्थिक रूप से बड़ी चुनौती है। फ्रांस के पास लड़ाकू विमान विकसित करने का अनुभव और आवश्यक तकनीकी क्षमता है, लेकिन छठी पीढ़ी के विमान के विकास में भारी निवेश की जरूरत होगी। विमान के डिजाइन, परीक्षण, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों, हथियारों और संबंधित तकनीकों पर लंबे समय तक खर्च करना पड़ेगा।
इसी वजह से फ्रांस अब ऐसे देशों की तलाश कर रहा है, जो परियोजना में तकनीकी भागीदारी के बजाय आर्थिक निवेश के माध्यम से सहयोग कर सकें। भारत इस संदर्भ में संभावित साझेदार के रूप में सामने आया है। भारत पहले ही फ्रांस के साथ इस परियोजना में जुड़ने की इच्छा जता चुका है। हालांकि, सहयोग का अंतिम स्वरूप, निवेश की शर्तें और भारत की संभावित भूमिका स्पष्ट होना बाकी है।
स्वीडन के साथ भी सहयोग को लेकर चर्चा हुई थी। ऐसे में फ्रांस के सामने यह विकल्प खुला है कि वह भविष्य में किन देशों को अपने साथ जोड़ता है। फिलहाल उसका प्रमुख उद्देश्य विमान के विकास पर राष्ट्रीय नियंत्रण बनाए रखते हुए जरूरी वित्तीय संसाधन जुटाना है।
फ्रांस की इस पहल का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 2027 में प्रस्तावित डेमोंस्ट्रेटर का विकास होगा। इसके बाद तकनीकी परीक्षण और आगे के विकास के आधार पर परियोजना की प्रगति तय होगी। वर्ष 2040 के शुरुआती दौर तक नए लड़ाकू विमान को तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, यह समयसीमा विकास, परीक्षण और वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करेगी।
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