
नई दिल्ली। पेट्रोल-डीजल के दामों को लेकर आम आदमी की चिंता के बीच सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। एक तरफ जहां पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10-10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई है, वहीं दूसरी तरफ डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर भारी ड्यूटी लगा दी गई है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या यह कदम सिर्फ जनता को राहत देने के लिए है या इसके पीछे कोई बड़ा आर्थिक गणित छिपा है?
CBIC के चेयरमैन विवेक चतुर्वेदी ने साफ किया कि पेट्रोल-डीजल पर टैक्स घटाने का मकसद आम लोगों को महंगाई से बचाना है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव की वजह से कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात करने वाले देश पर पड़ता है। ऐसे में सरकार ने दाम बढ़ने से रोकने के लिए टैक्स में कटौती की है।
चतुर्वेदी ने बताया कि तेल कंपनियां (OMCs) लंबे समय से नुकसान झेल रही थीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने के बावजूद कंपनियों ने घरेलू दाम नहीं बढ़ाए। इससे उनकी अंडर-रिकवरी यानी घाटा बढ़ता गया। टैक्स कटौती से इस दबाव को कम करने की कोशिश की गई है।
सरकार ने डीजल पर 21.5 रुपये प्रति लीटर और ATF पर 29.5 रुपये प्रति लीटर की एक्सपोर्ट ड्यूटी लगाई है। इसका मकसद साफ है कि देश में इन ईंधनों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना। जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें ज्यादा होती हैं, तो कंपनियां ज्यादा मुनाफे के लिए निर्यात बढ़ा देती हैं, जिससे घरेलू सप्लाई प्रभावित होती है।
सरकार ने यह भी साफ किया है कि विंडफॉल टैक्स या स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) की हर पखवाड़े समीक्षा की जाएगी। इससे बदलती परिस्थितियों के अनुसार तुरंत फैसले लिए जा सकेंगे। पहले 15 दिनों में ही इससे करीब 1500 करोड़ रुपये की कमाई का अनुमान है।
जहां एक तरफ सरकार ने टैक्स घटाकर राहत दी है, वहीं इससे सरकारी खजाने पर असर भी पड़ेगा। अनुमान है कि अगले 15 दिनों में करीब 7000 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान होगा। लेकिन सरकार का कहना है कि मौजूदा हालात में आम जनता को राहत देना ज्यादा जरूरी है।
हाल ही में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने ग्लोबल ऑयल सप्लाई को प्रभावित किया है। इसी कारण कच्चे तेल की कीमतों में करीब 50% तक उछाल आया है। यही वजह है कि सरकार को यह बड़ा कदम उठाना पड़ा।
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