
जो राज करने की नीति नहीं जानते हैं वो राजनीति (Politics) में आते हैं, फिर आंसू बहाते हैं… ईमानदारी (Honesty) का राग अलापते हैं… न जनता (public) को जानते हैं, न राज करने की नीति पहचानते हैं… जनता की सेवा का रागड़ा अलापते हैं… लेकिन न जनता सेवा चाहती है, न नेता सेवा के लिए राजनीति में आते हैं… दोनों ही मेवा को सेवा मानते हैं… नेता माल कमाता है और जनता को चुनाव से पहले नोट बांटता है… सत्ता की खुलेआम बोली लगाते हैं और जीत की गारंटी ले जाते हैं… अब केजरीवाल मोहल्ला क्लिनिक बनाते हैं, लेकिन अपने दिमाग का ही इलाज नहीं करा पाते हैं…स्कूलों के आंकड़े बताते हैं, लेकिन खुद ही ज्ञान घर पर धरकर राजनीति करने चले आते हैं…अब न नेहरू रहे, न गांधी…अब राजनीति है ऐसी आंधी, जिसमें विरोध और विरोधी दोनों सत्ता की ताकत के आगे नतमस्तक हो जाते हैं… जो इस सत्य को समझ नहीं पाते हैं वो समरथ में दोष निकालते हैं और फिर जेल जाकर आंसू बहाते हैं… इतना नहीं समझ पाते हैं कि भाजपा ने जनता और सत्ता दोनों पर कब्जा जमाया हुआ है…एक ओर देश की कमजोर नस हिंदूवाद को दबाया हुआ है, दूसरा जनता को मासिक खैरात से अपना बनाया हुआ है…इतने पर भी उन्होंने चैन नहीं पाया है…जहां विरोधी नेता ताकतवर नजर आता है उसे साम-दाम-दंड-भेद से अपना बनाया जाता है… किसी को मिटाया जाता है तो किसी की ताकत को बढ़ाकर अपने काम में लाया जाता है…अपना-पराया मिटाया जाता है…हेमंत बिस्वा को मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो सिंधिया को मंत्री… अब पंजाब से मान भी आ जाएं तो उनका भी सम्मान किया जाएगा, लेकिन जो आंख दिखाएगा उसे केजरीवाल बनाया जाएगा… नए भारत की राजनीति है, जिसमें राम की आंच भी है, संघर्ष भी है और सुकून भी है…जिसे जो चाहे वो हासिल कर ले…गलती केजरीवाल की थी… जनता ने ईमानदारी के नाम पर चुना तो मोदी को कोसने की बेईमानी तो नहीं करते… जिसे देश ने चुना उस पर तोहमतें लगाओगे और दिल्ली जीतकर शहंशाह बनना चाहोगे तो गुर्राहट, झुंझलाहट लाजिमी थी… लिहाजा आपको साफ करने का मंसूबा बनाया गया…यही गलती राहुल गांधी लगातार कर रहे हैं… वक्त को पहचान नहीं पा रहे हैं… आसमान पर थूकने की गलती से बाज नहीं आ रहे हैं और कांच के महल में रहकर पत्थर मार रहे हैं, इसलिए उनके शीशमहल से नेता भाग-भागकर भाजपा के किले में जा रहे हैं…केजरीवाल के फैसले से विरोधियों को संविधान पर उंगली उठाने का जवाब भी मिल गया…यदि संविधान कैद में होता तो केजरीवाल को इंसाफ नहीं मिलता…यह जवाब है कि अभी कानून जिंदा है…जो अपनी जीत पर इठला रहे हैं उन्हें उस जज के सामने सर झुकाना चाहिए, जिसने यह फैसला सुनाने की हिम्मत दिखाई… अब राम जाने इस हिम्मत की कीमत क्या होगी…
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