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RCEP पर भारत का स्पष्ट संदेश: चीन समर्थित व्यापार समझौते में शामिल नहीं होगा

January 29, 2026

नई दिल्ली । भारत (India)ने साफ किया है कि वह चीन (China)समर्थित क्षेत्रीय व्यापक (Economic)आर्थिक साझेदारी(Partnership) (RCEP) में शामिल होने पर फिलहाल कोई विचार नहीं कर रहा है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस संबंध में अभी कोई प्रस्ताव मौजूद नहीं है और आरसीईपी भारत की सक्रिय व्यापार नीति का हिस्सा नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत इस समय आरसीईपी में शामिल होने को लेकर न तो औपचारिक और न ही अनौपचारिक स्तर पर कोई पहल कर रहा है। सूत्रों ने उन अटकलों को खारिज किया है, जिनमें कहा जा रहा था कि पश्चिमी देशों के साथ व्यापार समझौतों को गति देने और एशिया में चुनिंदा द्विपक्षीय करार मजबूत करने के चलते भारत इस मुद्दे पर दोबारा विचार कर सकता है।

एक सरकारी सूत्र ने स्पष्ट कहा कि इस पर फिलहाल कोई विचार नहीं है। हमने इस विषय को एजेंडे में नहीं रखा है। वहीं, एक अन्य सूत्र ने राजनीतिक दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि आरसीईपी को देखने का एक नजरिया यह भी है कि यह मूल रूप से चीन के हितों को आगे बढ़ाने का माध्यम है। ये टिप्पणियां भारत की व्यापक व्यापार रणनीति के संदर्भ में सामने आई हैं, जिसमें बड़े बहुपक्षीय समझौतों के बजाय प्रमुख साझेदार देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों को प्राथमिकता दी जा रही है। सरकार का मानना है कि व्यापक क्षेत्रीय समझौते आयात से जुड़ी संवेदनशीलताओं को संभालने की भारत की क्षमता को कमजोर कर सकते हैं।

सूत्रों के अनुसार, चीन को छोड़कर आरसीईपी के अधिकांश सदस्य देशों के साथ भारत के पहले से ही द्विपक्षीय व्यापार समझौते मौजूद हैं, या तो वे पूरे हो चुके हैं या बातचीत के चरण में हैं। इसका अर्थ यह है कि भारत किसी बड़े क्षेत्रीय गुट में शामिल हुए बिना भी अपने बाजार पहुंच के लक्ष्यों को हासिल कर सकता है। अधिकारियों ने संकेत दिया कि भारत अन्य क्षेत्रीय और द्विपक्षीय ढांचों पर भी विचार कर रहा है। उनका कहना है कि जब भारत पर्याप्त संख्या में द्विपक्षीय समझौते कर लेगा, तब बड़े ढांचों में शामिल होने का सवाल भविष्य में उठ सकता है, लेकिन फिलहाल आरसीईपी भारत की नीतिगत प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है।

सरकार का यह रुख उन चिंताओं से भी जुड़ा है, जो उसने यूरोपीय संघ के साथ व्यापार वार्ताओं के दौरान ऑटोमोबाइल और कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर जताई थीं। भारत ने यूरोपीय संघ के साथ समझौते में समय के साथ लगभग 92 प्रतिशत टैरिफ लाइनों को खोलने पर सहमति जताई है, लेकिन संवेदनशील क्षेत्रों के लिए चरणबद्ध कटौती, कोटा और टैरिफ-रेट कोटा जैसे उपाय अपनाए गए हैं। सूत्रों का कहना है कि आरसीईपी से दूरी बनाए रखने का एक प्रमुख कारण यह आशंका है कि चीन के साथ व्यापक टैरिफ कटौती का ढांचा भारत की संवेदनशील क्षेत्रों में जोखिम प्रबंधन की क्षमता को सीमित कर सकता है।

उन्होंने यह भी बताया कि कोविड महामारी के बाद आपूर्ति श्रृंखला में आए झटकों और व्यापार दुरुपयोग के अनुभवों के चलते वैश्विक व्यापार व्यवस्था एक समान, WTO-केंद्रित मॉडल से हटकर द्विपक्षीय समझौतों के जटिल नेटवर्क की ओर बढ़ रही है। ऐसे माहौल में भारत लचीलापन चाहता है, कुछ चुनिंदा साझेदारों के साथ गहरे संबंध, लेकिन किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचाव।

सूत्रों ने भारत–यूरोपीय संघ समझौते को ‘जोखिम कम करने और विविधीकरण’ की वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा बताया और कहा कि किसी एक बाजार या आपूर्ति स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता खतरनाक हो सकती है। यही सोच अप्रत्यक्ष रूप से आरसीईपी के पक्ष में दिए जाने वाले तर्कों के विपरीत जाती है, जिसके चलते भारत ने 2019 में बाजार पहुंच, मूल नियमों और आयात में अचानक बढ़ोतरी की आशंकाओं का हवाला देते हुए इससे बाहर रहने का फैसला किया था।

  • फिलहाल नई दिल्ली का संदेश साफ है कि गुटीय व्यवस्था के बजाय द्विपक्षीय समझौते, व्यापक उदारीकरण के बजाय संतुलित खुलापन और चीन से जुड़े जोखिम बढ़ाने वाली किसी भी व्यवस्था से दूरी। सरकार का ‘अभी कोई प्रस्ताव नहीं’ पर जोर घरेलू उद्योग के लिए भी एक स्पष्ट संकेत है, जो आरसीईपी को लेकर पहले से ही सतर्क रुख अपनाए हुए है।

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