
इंदौर। अभी लोकायुक्त प्रधान आरक्षक चालक पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय के फिरोज खान (Feroz Khan) की सम्पत्तियों (properties) की जांच में जुटा है। कल तक 50 से अधिक अचल सम्पत्तियों का खुलासा इस जांच में हुआ, जिसमें 65 करोड़ रुपए से अधिक की कीमत आंकी गई, वहीं एक मामला इंदौर-उज्जैन (Indore-Ujjain) रोड के मगरखेड़ा की 45 बीघा जमीन का भी सामने आया है, जिसकी वर्तमान बाजार कीमत 100 करोड़ रुपए (₹100 crore) से अधिक बताई जा रही है। पॉवर ऑफ अटार्नी के जरिए जिस फर्म ने यह जमीन खरीदी वह भी फर्जी निकली। वहीं उसके पक्ष में तहसीलदार द्वारा किया गया नामांतरण आदेश एसडीएम मल्हारगंज निधि वर्मा ने खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ संभागायुक्त कार्यालय में की गई अपील से भी जमीन खरीदने वाली फर्म श्याम इन्फ्रा को राहत नहीं मिल सकी। इस जमीन की रजिस्ट्री में फिरोज खान भी गवाह के रूप में मौजूद है, लिहाजा लोकायुक्त एसपी डॉ. राजेश साय के मुताबिक इस सौदे को भी जांच के दायेर में लिया जा रहा है।
पिछले दिनों लोकायुक्त महानिदेशक योगेश देशमुख और उप पुलिस महानिदेशक मनोज कुमार सिंह के निर्देश पर इंदौर लोकायुक्त एसपी डॉ. सहाय ने फिरोज खान के ठिकानों पर छापे मारे थे, जिसमें इंदौर, देवास से लेकर अन्य जगह कई अचल सम्पत्तियों की जानकारी सामने आई। वहीं फिरोज खान की इस चल रही जांच के चलते मगरखेड़ा की जमीन का सौदा भी चर्चा में आ गया। सर्वे नम्बर 189, 190, 191 से लेकर 195 और 229/3/5 में शामिल लगभग 45 बीघा जमीन मूल रूप से कस्तूरी बाई के नाम पर राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज रही और इस जमीन की पॉवर ऑफ अटार्नी बच्चों की बजाय रविकांत पंवार के नाम की और उसने ये जमीन श्याम इन्फ्रा तर्फे पार्टनर सुमित जिंदल निवासी अपोलो डीबी सिटी निपानिया को बेच दी। इस जमीन का नामांतरण तत्कालीन तहसीलदार नारायण नांदेड़ा ने कोर्ट स्टे और तमाम आपत्तियों के बावजूद कर डाला, जबकि 27 अक्टूबर 2024 को ही यथास्थिति के आदेश दे दिए थे और उसके बाद ताबड़तोड़ फाइल चलाते हुए वारिसों द्वारा लगाई गई आपत्तियों को भी दरकिनार करते हुए नामांतरण कर दिया, जिसके चलते प्रार्थी लीलाबाई, कैलाश, लक्ष्मीबाई, राधाबाई, अशोक शर्मा, संतोष, अर्जुन, सीताबाई अन्य वारिसों ने मल्हारगंज एसडीएम के समक्ष अपील दायर की, जिसमें यह भी आरोप लगाया गया कि कम प्रचार संख्या वाले समाचार-पत्रों में नामांतरण की सूचना प्रकाशित करवाई गई। हालांकि उनके द्वारा आपत्ति भी ली गई और साथ ही जिस श्याम इन्फ्रा को यह जमीन बेची गई वह एक भागीदारी फर्म कागजों पर बताई गई, लेकिन आवेदन-पत्र या विक्रय-पत्र में इस तथाकथित भागीदारी फर्म के पंजीकृत होने के संबंध में कोई उल्लेख नहीं किया गया और ना ही पंजीकरण नम्बर बताया गया। फर्म के सभी भागीदारों की जानकारी भी स्पष्ट नहीं की गई और कूटरचित फर्जी फर्म बनाकर अपने पक्ष में विक्रय-पत्र का पंजीयन करवा लिया और जिसके आधार पर बाद में नामांतरण भी। जबकि उक्त विक्रय-पत्र को भी सिविल न्यायालय में चुनौती दे दी गई है और पहले से ही यथास्थिति भी प्राप्त है। इन तमाम तर्कों से सहमत होकर एसडीएम निधि वर्मा ने तहसीलदार का नामांतरण आदेश खारिज कर दिया और उसके बाद इस आदेश के खिलाफ संभागायुक्त को की गई अपील भी खारिज हो गई।
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