
नई दिल्ली। सड़क परिवहन मंत्रालय (Ministry of Road Transport) के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2019 से 2023 के बीच देश में सड़कों पर बने गड्ढों (Potholes Roads) के कारण हुए सड़क हादसों (Road Accidents) में 9,109 लोगों की मौत हुई थी.यह आंकड़ा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है.वर्ष 2022 में जहां ऐसे हादसों में 1,856 लोगों की मौत हुई, वहीं 2023 में यह आंकड़ा बढ़ कर 2,161 तक पहुंच गया.यानी उस साल रोजाना औसतन छह लोगों की मौत हुई थी.उसके बाद का आंकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
यह गड्ढे दोपहिया वाहनों और पैदल चलने वालों के लिए सड़क हादसे की सबसे प्रमुख वजह बन गए हैं.मानसून में यह समस्या बेहद गंभीर हो जाती है.बीते सप्ताह दिल्ली के जनकपुरी इलाके में जल बोर्ड की ओर से खोदे गए गड्ढे में गिरकर कमल नामक 25 वर्ष के एक युवक की मौत हो गई थी।
अदालतों की फटकार भी बेअसर
बंबई हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने बीते साल अक्तूबर में इन मौतों से संबंधित एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद ऐसे मामलों में मृतकों के परिजनों को कम से कम छह लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया था.इससे पहले जुलाई 2018 में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की थी कि सड़कों पर बने गड्ढों के कारण होने वाले हादसों से साफ है कि इनके लिए जिम्मेदार अधिकारी सही तरीके से अपनी ड्यूटी नहीं निभा रहे हैं. शीर्ष अदालतों की टिप्पणी और फटकार के बावजूद यह समस्या कम होने की बजाय बढ़ती ही जा रही है।
परिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि सड़कों पर बने गड्ढे दोपहिया वाहनों के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं.सड़कों की मरम्मत के लिए जिम्मेदार नगर निगम, लोक निर्माण विभाग या नगरपालिकाएं अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाती.क्यों बनते हैं सड़कों पर गड्ढे?लेकिन आखिर सड़कों पर ऐसे गड्ढे क्यों हो जाते हैं और समय पर इनकी मरम्मत के उपाय क्यों नहीं किए जाते?
इस सवाल पर लोक निर्माण विभाग के एक पूर्व इंजीनियर समरेश भट्टाचार्य डीडब्ल्यू से कहते हैं, “मानसून के सीजन में सड़कों पर पानी भरना और रिसना इसका एक प्रमुख कारण है.ज्यादातर मामलों में सड़कों पर भरे पानी को निकालने के लिए ड्रेनेज सिस्टम ठीक नहीं होता. उस दौरान भारी वाहनों के गुजरने के कारण सड़कों पर गड्ढे बन जाते हैं.इसके अलावा सड़क निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल भी दूसरी बड़ी वजह है”समरेश का कहना है कि कई बार बिजली और जल निगम जैसे विभाग भी सड़कों पर गड्ढे खोदकर उनको जस का तस छोड़ देते हैं.विभिन्न विभागों के बीच तालमेल की कमी इस समस्या को और गंभीर बना देती है.उनके मुताबिक, कोई बड़ा हादसा होने के बाद राजनीतिक तौर पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है और तमाम विभाग अपना पल्ला झाड़ने लगते हैं.
मुआवजे की कोई गारंटी नहीं
एक गैर-सरकारी संगठन के संयोजक मोहम्मद तस्लीम डीडब्ल्यू से कहते हैं, “हाल की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि गड्ढों के कारण रोजाना 19 सड़क हादसे होते हैं और इनमें औसतन छह लोगों की मौत हो जाती है.इसके अलावा कई लोग गंभीर रूप से घायल होकर जीवन भर के लिए अपाहिज हो जाते हैं.ऐसे लोगों का कोई आंकड़ा नहीं है” उनके मुताबिक, ऐसे हादसों में वाहनों को होने वाले नुकसान का भी कोई आंकड़ा कहीं नहीं मिलता. क्या ऐसे हादसों से प्रभावित लोगों को कानूनी तौर पर मुआवजा मिल सकता है?
कलकत्ता हाईकोर्ट के एक एडवोकेट दीपक कुमार डीडब्ल्यू से कहते हैं, “सैद्धांतिक तौर पर प्रभावित लोग या उनके परिजन मुआवजे के हकदार हैं.लेकिन न्याय का रास्ता लंबा और जटिल है और उसके बाद भी जीत की कोई गारंटी नहीं है.कानूनी खामियों का फायदा उठा कर अक्सर तमाम विभाग एक-दूसरे पर अंगुली उठा कर बच निकलते हैं”हादसों को कैसे रोका जाएपरिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ जगह एआई तकनीक वाले कैमरे से सड़कों पर बने गड्ढों का पता लगा कर उनकी मरम्मत का काम जरूर किया जा रहा है लेकिन यह नाकाफी है.समरेश कहते हैं कि ऐसे हादसों पर अंकुश लगाने के लिए विभागों की जवाबदेही तय करनी होगी और तय समय सीमा के भीतर गड्ढों की मरम्मत नहीं करने की स्थिति में उन पर भारी जुर्माना लगाना होगा.वहीं मोहम्मद तस्लीम का कहना है कि समस्या तकनीक या पैसों की नहीं बल्कि इच्छाशक्ति और सोच की है.जब तक संबंधित विभागों का रवैया लापरवाह रहेगा, ऐसे हादसे बढ़ते ही रहेंगे.सड़क जैसे आधारभूत ढांचे के प्रबंधन पर गंभीरता से ध्यान दिया जाने की जरूरत है।
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