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विधान परिषद में स्थानीय निकाय के प्रतिनिधियों के चुनाव परिणाम का संदेश

– संजय तिवारी

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा ने इतिहास रचा है। विधान परिषद में स्थानीय निकाय की 36 में से 33 सीटों पर विजय पाकर भाजपा अब विधान परिषद में भी पूर्ण बहुमत पा चुकी है। यह चुनाव और इसके परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इसमे कहीं भी किसी स्तर पर जोर-जबरदस्ती, वोटरों की खरीद-फरोख्त या डराने-धमकाने जैसी कोई खबर नहीं है। ऐसा पहली बार हुआ है कि अभी विधानसभा के परिणाम आये केवल एक माह बीता है लेकिन जनादेश प्रचंड स्वरूप में भाजपा के पक्ष में मिला है। यह निश्चित रूप से योगी आदित्यनाथ के सुशासन और विकास के मॉडल की विजय है।

इस जबरदस्त जीत के साथ भारतीय जनता पार्टी ने इतिहास रच दिया है। ऐसा पहली बार हो रहा है जब विधानसभा के साथ-साथ किसी पार्टी को विधान परिषद में भी बहुमत हासिल हुआ है। जीतने वालों की फेहरिस्त में उत्तर प्रदेश की राजनीति के बड़े-बड़े दिग्गजों के नाम शामिल हैं। सभी की सूची इसी आलेख के साथ दी जा रही है। यह सूची अब सामान्य बात है। महत्व इस बात का है कि अपने गठन के इतिहास में उत्तर प्रदेश की विधान परिषद की ऐसी तस्वीर आने के बाद यह जरूरी हो जाता है कि इस सदन को इसके आरंभ से जरूर देखा जाय।

दस्तावेज बता रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में विधान परिषद 1935 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा पहली बार अस्तित्व में आई थी। उस समय विधान परिषद में 60 सदस्य शामिल थे। परिषद के एक सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता था और इसके एक तिहाई सदस्य हर दो साल बाद सेवानिवृत्त हो जाते थे। सदनों को राष्ट्रपति के रूप में ज्ञात अपने पीठासीन अधिकारियों के चुनाव का अधिकार प्राप्त था। विधान परिषद की पहली बैठक 29 जुलाई 1937 को हुई थी। सर सीताराम और बेगम एजाज रसूल क्रमशः विधान परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुने गए थे। सर सीताराम 9 मार्च 1949 तक पद पर थे। चंद्र भाल 10 मार्च 1949 को अगले अध्यक्ष बने। भारत की स्वतंत्रता और 26 जनवरी 1950 को संविधान को अपनाने के बाद चंद्र भाल फिर से विधान परिषद के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने 5 मई 1958 तक सेवा की। श्री निजामुद्दीन 27 मई 1952 को परिषद के उपाध्यक्ष चुने गए। उन्होंने 1964 तक सेवा की। जब, भारत सरकार अधिनियम 1935 के प्रावधानों के तहत, संयुक्त प्रांत में विधान परिषद अस्तित्व में आई , इसमें 60 सदस्य शामिल थे।

26 जनवरी 1950 को उत्तर प्रदेश राज्य की विधान परिषद (विधान परिषद) की कुल सदस्यता 60 से बढ़ाकर 72 कर दी गई थी। संविधान (सातवें संशोधन) अधिनियम 1956 के साथ, परिषद की ताकत बढ़ाकर 108 कर दी गई थी। पुनर्गठन के बाद नवंबर 2000 में उत्तर प्रदेश राज्य के गठन और उत्तराखंड राज्य के निर्माण के बाद अब यह संख्या घटकर अब 100 हो गई है। उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की वर्तमान रचना में 10 सदस्य उत्तर प्रदेश के राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। 38 सदस्य उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं । 36 सदस्य स्थानीय निकायों द्वारा चुने जाते हैं। 8 सदस्य शिक्षकों द्वारा चुने जाते हैं। 8 सदस्य स्नातकों द्वारा चुने जाते हैं।

सदस्य अब छह साल के लिए निर्वाचित या मनोनीत होते हैं और उनमें से एक तिहाई हर दूसरे वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त हो जाते हैं, इसलिए एक सदस्य छह साल तक बना रहता है। प्रत्येक तीसरे वर्ष की शुरुआत में रिक्त सीटों को नए चुनाव और नामांकन (राज्यपाल द्वारा) द्वारा भरा जाता है। सेवानिवृत्त होने वाले सदस्य भी कई बार फिर से चुनाव और पुनर्नामांकन के लिए पात्र होते हैं। विधान परिषद के पीठासीन अधिकारी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होते हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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