
मुंबई। मालेगांव ब्लास्ट मामले (Malegaon Blast Case) में बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने साफ किया है कि किसी आरोपी की बरी (Bail) के फैसले के खिलाफ अपील दायर (Appeal Filed) करने का अधिकार हर किसी को नहीं है। अदालत ने कहा कि यह कोई खुला दरवाजा नहीं है कि कोई भी व्यक्ति अपील लेकर पहुंच जाए। हाईकोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि मृतकों के परिजनों को ट्रायल के दौरान गवाह बनाया गया था या नहीं।
यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंकड़ की खंडपीठ ने की। अदालत छह पीड़ितों के परिजनों द्वारा दायर अपील सुन रही थी, जिसमें विशेष एनआईए अदालत के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें सात आरोपियों को बरी कर दिया गया था। इन आरोपियों में भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित भी शामिल थे।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि क्या पीड़ित परिवारों के सदस्य गवाह थे। पीड़ित पक्ष के वकील ने बताया कि पहले अपीलकर्ता निसार अहमद, जिनके बेटे की मौत धमाके में हुई थी, ट्रायल में गवाह नहीं बने थे। इस पर अदालत ने कहा कि अगर बेटे की मौत हुई थी तो पिता को गवाह होना चाहिए था। अदालत ने आदेश दिया कि इस बारे में पूरी जानकारी बुधवार को दी जाए।
परिजनों की ओर से दाखिल अपील में कहा गया है कि जांच में खामियां होना या जांच एजेंसियों की गलती होना बरी करने का आधार नहीं हो सकता। उन्होंने दावा किया कि ब्लास्ट की साजिश गुप्त तरीके से रची गई थी, इसलिए उसका सीधा सबूत मिलना संभव नहीं था। अपील में यह भी कहा गया कि 31 जुलाई को एनआईए की विशेष अदालत द्वारा दिया गया फैसला गलत और कानून के खिलाफ था, जिसे रद्द किया जाना चाहिए।
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