
नई दिल्ली: कल्पना कीजिए कि आपके घर में जलने वाला बल्ब उस बिजली से रोशन हो, जो हजारों किलोमीटर दूर सऊदी अरब या दुबई के रेगिस्तान में तैयार हुई हो. यह कल्पना अब हकीकत बनने की ओर है. दरअसल, भारत सरकार, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ मिलकर समुद्र के नीचे बिजली की केबल बिछाने की तैयारी कर रही है. यह परियोजना न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि यह दुनिया का सबसे बड़ा सीमा-पार एनर्जी एक्सचेंज सिस्टम बन सकता है.
समुद्र के नीचे बिछेगा ‘बिजली का हाईवे’
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस महात्वाकांक्षी परियोजना के लिए सरकार जल्द ही निविदा (टेंडर) जारी करने वाली है. योजना के तहत, अरब सागर के नीचे हाई-वोल्टेज डायरेक्ट करंट (HVDC) केबल्स का जाल बिछाया जाएगा. यह तकनीक लंबी दूरी तक बिजली को बिना किसी बड़े नुकसान के पहुंचाने में सक्षम है.
इस प्रोजेक्ट की सबसे खास बात यह है कि यह केवल एकतरफा आयात नहीं होगा. यह एक ‘टू-वे ट्रैफिक’ की तरह काम करेगा. यानी, जरूरत पड़ने पर भारत इन खाड़ी देशों से बिजली लेगा, और जब हमारे पास अतिरिक्त बिजली होगी, तो हम उन्हें आपूर्ति भी करेंगे. यह ग्रिड इंटरकनेक्शन दोनों पक्षों के लिए संकट के समय एक बड़े सहारे का काम करेगा.
इतनी दूर से क्यों लाई जा रही बिजली ?
अब सवाल उठता है कि आखिर इतनी दूर से बिजली लाने का क्या फायदा है? इसका जवाब छिपा है ‘समय’ में. भारत और सऊदी अरब के समय में लगभग तीन घंटे का अंतर है. जब भारत में शाम हो जाती है और सौर ऊर्जा (सोलर पावर) का उत्पादन बंद हो जाता है, उस वक्त सऊदी अरब में सूरज चमक रहा होता है.
इस नए समझौते के तहत, भारत शाम के वक्त अपनी बिजली की मांग को पूरा करने के लिए सऊदी अरब से रियल टाइम में सौर ऊर्जा आयात कर सकेगा. ठीक इसके विपरीत, जब भारत में दिन होगा और हमारे यहां सौर ऊर्जा का उत्पादन चरम पर होगा, हम अपनी अतिरिक्त बिजली सऊदी अरब और यूएई को भेज सकेंगे. यह तालमेल न केवल बिजली की दरों को सस्ता कर सकता है, बल्कि ग्रिड को भी स्थिर रखेगा.
सौर ऊर्जा की साझेदारी
सालों से भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों, खासकर कच्चे तेल के लिए, सऊदी अरब और यूएई पर निर्भर रहा है. लेकिन अब यह रिश्ता बदल रहा है. तेल के भंडार वाले ये देश अब जानते हैं कि भविष्य जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) का नहीं, बल्कि क्लीन एनर्जी का है.
सऊदी अरब अपने ‘विजन 2030’ और यूएई ‘नेट जीरो 2050’ के लक्ष्य के तहत खुद को एक जिम्मेदार ‘ग्रीन एनर्जी’ उत्पादक के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. भारत, जो सौर और पवन ऊर्जा तकनीक में तेजी से आगे बढ़ रहा है, इस काम में उनका प्रमुख साझीदार बनेगा. भारत इन देशों को न केवल बिजली देगा, बल्कि अपनी तकनीक और मैन-पावर से उनके इंफ्रास्ट्रक्चर को खड़ा करने में भी मदद करेगा.
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