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सप्लाई चेन में रुकावटों से बचने का एक ही उपाय ‘आत्मनिर्भरता’ है – रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

March 06, 2026


कोलकाता । रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (Defence Minister Rajnath Singh) ने कहा कि सप्लाई चेन में रुकावटों से बचने का (To avoid disruptions in the Supply Chain) एक ही उपाय ‘आत्मनिर्भरता’ है (Only way is ‘Self-reliance’) । पश्चिम बंगाल के दौरे पर पहुंचे केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह शुक्रवार को कोलकाता में आयोजित “मैरीटाइम कॉन्क्लेव सागर संकल्प” में शामिल हुए ।


  • कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा, “पश्चिम बंगाल की धरती की अलग ऊर्जा है। इस भूमि ने एक तरफ भारत को साहित्य और कला दी और दूसरी तरफ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नेशनल प्राइड को भी दिशा दी है । एक समय था कि जब समुद्री रास्ते से कोई वस्तु आती थी तो कोलकाता केंद्र हुआ करता था। हुबली के किनारे बसा ये शहर के देश की आर्थिक मजबूती का साक्षी रहा है। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) लिमिटेड की ओर से आयोजित कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए कहा कि मीडिया केवल सूचना देने का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज को एक दिशा भी देता है। राजनाथ सिंह ने कहा कि जब भारत के गौरवशाली इतिहास पर ध्यान देते हैं तो कई सारी बातें पता चलती हैं। ढाई हजार साल पहले से लेकर मध्यकालीन तक भारत ग्लोबल ट्रेड का प्रमुख सेंटर रहा है। उन्होंने कहा कि उस समय जब दुनिया के कई हिस्से विकास के प्रारंभिक अवस्था में थे तब भारत ज्ञान, व्यापार और संस्कृति के क्षेत्र में अहम भूमिका निभा रहा था। उस समय भारत के जहाज समुद्री मार्गों से दूर-दूर तक यात्रा करते थे। हमारा संपर्क रोमन एंपायर और मेसबटोमिया सभ्यता तक स्थापित था। उस समय श्रीलंका और दक्षिण पूर्व एशिया, कंबोडिया और इंडोनेशिया तक भारतीय व्यापारियों और समुद्री यात्रियों की पहुंच थी।

    रक्षा मंत्री ने कहा कि समुद्री क्षेत्र की अहमियत को ध्यान में रखते हुए, यह ज़रूरी है कि हम अपने प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीक को साथ लेकर आगे बढ़ें। जो राष्ट्र अपने इतिहास से प्रेरणा लेता है, वही भविष्य को आत्मविश्वास के साथ मज़बूती देता है। आज समुद्री क्षेत्र पहले की तुलना में, काफी बदल चुका है। आज के समय में समुद्री क्षेत्र सिर्फ़ व्यापार के रास्ते या नौसैनिक ताकत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास, तकनीकी इनोवेशन और रणनीतिक स्वायत्तता का अहम आधार बन चुका है। रक्षा क्षेत्र में आज हाई एंड और सटीक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हो रहा है, इसीलिए केंद्र सरकार की शुरू से सोच रही है कि इस अनिश्चितता के दौर में सप्लाई चेन में रुकावटों से बचने का एक ही उपाय ‘आत्मनिर्भरता’ है। हमारी आत्मनिर्भरता के विज़न की एक प्रमुख धुरी रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रम है। अब पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन, प्रदर्शन बेंचमार्किंग और आर एंड डी पर खास ज़ोर दिया जा रहा है।

    रक्षा मंत्री ने आगे कहा, भारत के रक्षा क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र की प्राथमिकता रही है। पहले ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड ने रक्षा निर्माण में एक प्रमुख भूमिका निभाई। चार शिपयार्ड सहित विभिन्न क्षेत्रों में रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने राष्ट्रीय सुरक्षा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन लगातार दबाव के मद्देनजर और हमारे रक्षा उत्पादन को गुणात्मक और मात्रात्मक बढ़ोतरी प्रदान करने के उद्देश्य से कई संरचनात्मक और नीतिगत सुधारों को लागू किया है, जिससे दक्षता, जवाबदेही और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। इन शिपयार्ड को उत्पादन इकाइयों के साथ-साथ, प्रौद्योगिकी केंद्रों के रूप में विकसित करने का भी लक्ष्य रखा गया है। इंफ्रास्ट्रक्चर आधुनिकीकरण, डिजिटल शिप डिजाइन टूल्स, मॉड्यूलर निर्माण तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण के माध्यम से इन्हें वैश्विक मानकों तक ले जाने का प्रयास किया जा रहा है। हम अपने उद्देश्यों में सफल भी हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि “हमारा उद्देश्य यही रहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ें और आज यह हो भी रहा है। इसके अच्छे परिणाम भी हमारे सामने हैं। आज देश में उत्पादन होने वाले रक्षा सामग्री, प्लेटफॉर्म, उपकरण और सहायक उपकरण में लगभग 25 प्रतिशत योगदान निजी उद्योगों से आ रहा है।”

    उन्होंने कहा कि “यह गर्व की बात है, कि निजी उद्योग लगातार बेहतर कर रहे हैं। रक्षा क्षेत्र में भारत पूरी गति के साथ आत्मनिर्भरता की ओर अपने कदम बढ़ा चुका है। पिछले वित्त वर्ष तक हमारा घरेलू रक्षा उत्पादन, डेढ़ लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड आंकड़ों को भी पार कर चुका है। साथ ही, हमारा डिफेंस एक्सपोर्ट भी 24,000 करोड़ रुपए के रिकॉर्ड आंकड़ों को पार चुका है। हालांकि इन आँकड़ों से हमें अभिभूत नहीं हो जाना है। हमें अभी और आगे जाना है।” उन्होंने कहा, ” आत्मनिर्भरता हमारे लिए केवल एक नारा नहीं रही बल्कि एक व्यावहारिक वास्तविकता के रूप में स्थापित हो रही है। आज स्थिति यह है कि हम जिस आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के साथ आगे बढ़े थे, उसके सकारात्मक परिणाम हमारे सामने हैं। आज भारतीय नौसेना के लिए भी, जितने युद्धपोत और पनडुब्बियां ऑर्डर पर हैं, वे सभी भारतीय शिपयार्ड में बन रही हैं। आज हम डिजाइन, इंजीनियरिंग, निर्माण तक की पूरी क्षमता अपने भीतर विकसित कर रहे हैं। जब हम कहते हैं कि हम बिल्डर्स नेवी बन चुके हैं, तो यह कोई नारा नहीं है, यह जमीनी हकीकत है।”

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