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युद्ध का असली उद्देश्य दुश्मन की इच्छाशक्ति को तोड़ना होता है – अजीत डोभाल

January 10, 2026


नई दिल्ली । अजीत डोभाल (Ajit Dobhal) ने कहा कि युद्ध का असली उद्देश्य (Real purpose of War) दुश्मन की इच्छाशक्ति को तोड़ना होता है (Is to break the will of the Enemy) ।


  • नई दिल्ली में आयोजित विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग के उद्घाटन अवसर पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का वक्तव्य केवल युद्ध की परिभाषा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने राष्ट्रीय इच्छाशक्ति, मनोबल और नेतृत्व की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया। उनका बयान ऐसे समय आया है, जब वैश्विक स्तर पर युद्ध और संघर्ष केवल हथियारों की ताकत नहीं, बल्कि मानसिक और रणनीतिक दबाव का प्रतीक बन चुके हैं। डोभाल ने स्पष्ट किया कि युद्ध किसी मनोरोगी मानसिकता से नहीं लड़े जाते, जहां दुश्मन के शव या तबाही देखकर संतोष कर लिया जाए।

    उनके अनुसार, युद्ध का असली उद्देश्य दुश्मन की इच्छाशक्ति को तोड़ना होता है, ताकि वह हमारी शर्तों पर झुकने को मजबूर हो। यह कथन आधुनिक युद्ध सिद्धांतों के अनुरूप है, जहां मनोवैज्ञानिक दबाव, रणनीतिक बढ़त और नैरेटिव कंट्रोल निर्णायक भूमिका निभाते हैं। उनका यह तर्क कि संसाधन और हथियार होने के बावजूद अगर किसी देश का मनोबल कमजोर है, तो वह शक्ति निरर्थक हो जाती है—सीधे तौर पर नेतृत्व की अहमियत को सामने लाता है। डोभाल ने मौजूदा नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए कहा कि बीते दस वर्षों में देश ने जिस तरह से अपनी स्थिति बदली है, वह मजबूत नेतृत्व और स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टि का परिणाम है। यह टिप्पणी राजनीतिक संकेत भी देती है, जहां सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और वैश्विक छवि को मौजूदा शासन की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया।

    इतिहास के संदर्भ में डोभाल ने भारत के संघर्षपूर्ण अतीत को याद करते हुए युवाओं से आत्ममंथन की अपील की। उनका कहना था कि स्वतंत्रता सहज रूप से नहीं मिली, बल्कि बलिदान, अपमान और अत्याचारों की लंबी श्रृंखला के बाद हासिल हुई। इस ऐतिहासिक स्मृति को उन्होंने आज के युवाओं के लिए एक नैतिक और भावनात्मक चुनौती के रूप में पेश किया। ‘बदला’ शब्द के प्रयोग ने उनके भाषण को सबसे ज्यादा बहस योग्य बना दिया। हालांकि उन्होंने इसे हिंसा या आक्रामकता के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनरुत्थान की भावना के रूप में परिभाषित किया—अर्थात् भारत को उसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैचारिक ऊंचाई पर वापस ले जाना। यह विचारधारा सुरक्षा विमर्श को सांस्कृतिक आत्मबोध से जोड़ती है।

    डोभाल का यह भी कहना कि भारत की सभ्यता मूलतः अहिंसक और गैर-आक्रामक रही है, लेकिन सुरक्षा खतरों को समय रहते समझने में चूक हुई—एक आत्मालोचनात्मक स्वीकारोक्ति है। इससे संकेत मिलता है कि भविष्य की रणनीति में केवल नैतिक श्रेष्ठता नहीं, बल्कि व्यावहारिक सतर्कता भी आवश्यक है। समग्र रूप से देखा जाए तो अजीत डोभाल का भाषण युद्ध, नेतृत्व, इतिहास और युवा शक्ति को एक साझा नैरेटिव में पिरोता है। यह संदेश युवाओं को केवल प्रेरित करने का नहीं, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और इच्छाशक्ति की जिम्मेदारी से जोड़ने का प्रयास भी है। वहीं, 12 जनवरी को प्रधानमंत्री द्वारा 3,000 युवाओं से संवाद की घोषणा इस विमर्श को राजनीतिक और वैचारिक विस्तार देती है, जहां ‘विकसित भारत’ की अवधारणा को अगली पीढ़ी से जोड़ने की रणनीति साफ दिखाई देती है।

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