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बिना मिट्टी हवा में उगे आलू, ग्वालियर के वैज्ञानिकों ने रचा एरोपोनिक्स से कृषि का भविष्य

February 08, 2026

ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में वैज्ञानिकों ने खेती की दुनिया में बड़ा प्रयोग कर दिखाया है। राजमाता विजया राजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय (Rajmata Vijaya Raje Scindia Agricultural University) के वैज्ञानिकों ने बिना मिट्टी के हवा में आलू (potatoes in the air) उगाने में सफलता हासिल की है। ये आलू विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की एरोपोनिक्स लैब यूनिट में तैयार किए गए हैं, जहां केवल फॉगिंग और पोषक तत्वों की मदद से आलू की करीब 20 अलग-अलग किस्मों के बीज विकसित किए जा रहे हैं।

वैज्ञानिकों का दावा है कि इस तकनीक से तैयार किए गए आलू के बीज कई बीमारियों और वायरस से पूरी तरह मुक्त हैं।

मिट्टी नहीं, हवा में लटकती हैं जड़ें

जैव प्रौद्योगिकी विभाग की वैज्ञानिक और एरोपोनिक प्रोजेक्ट की इंचार्ज डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया कि एरोपोनिक तकनीक में पौधों को पहले टिशू कल्चर के माध्यम से लैब में विकसित किया जाता है। इसके बाद इन पौधों को मिट्टी में नहीं लगाया जाता।
एरोपोनिक यूनिट में ट्रांसप्लांट करने से पहले करीब एक महीने तक हार्डनिंग की जाती है, जिसके बाद पौधों की जड़ें हवा में लटकी रहती हैं।



  • फॉगिंग सिस्टम से मिलता है पूरा पोषण

    डॉ. तिवारी के अनुसार, पौधों की जड़ों के हिस्से को हल्का काटने के बाद मिस्ट या फॉगिंग सिस्टम के जरिए लगातार नमी बनाए रखी जाती है।
    पोषक तत्व भी इसी फॉगिंग तकनीक से दिए जाते हैं। आलू के बल्ब बनने तक जड़ों को मिलने वाला पूरा पोषण हवा और फॉगिंग सिस्टम के जरिए ही होता है। इसी प्रक्रिया से उच्च गुणवत्ता वाले आलू के बीज, जिन्हें मिनी ट्यूबर कहा जाता है, तैयार होते हैं।

    बीमारी मुक्त और ज्यादा पैदावार

    डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया कि मिट्टी में उगाए गए आलू में अक्सर रोग और वायरस का खतरा रहता है, लेकिन एरोपोनिक तकनीक से तैयार आलू पूरी तरह रोग मुक्त होते हैं।
    ये बीज ज्यादा हेल्दी होते हैं और इनसे उत्पादन भी कई गुना अधिक होता है।

    1 किलो बीज से 4 क्विंटल आलू

    एरोपोनिक तकनीक से तैयार किए गए बीजों का वजन बेहद कम होता है। इन मिनी ट्यूबर का वजन केवल 2 से 3 ग्राम होता है।
    डॉ. तिवारी के मुताबिक, दो साल पहले जब इस तकनीक की शुरुआत की गई थी, तब एक किलोग्राम मिनी ट्यूबर से करीब 400 किलोग्राम सामान्य आलू का उत्पादन हुआ था। हालांकि किसानों को ये बीज जी-2 प्रोसेस के बाद ही उपलब्ध कराए जाते हैं।

    यह तकनीक भविष्य में किसानों की लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने में क्रांतिकारी साबित हो सकती है।

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