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विकास के शहर में चीखों की चित्कार… तीन इंजन की सरकार का यह कैसा उपहार…

September 16, 2025

प्रधानमंत्री ने विश्वास दिलाया… डबल इंजन की शक्ति का अहसास कराया… विकास की गति का आइना दिखाया… हमने पूरे शहर की सत्ता सौंप दी… गांवों में भी कमल खिला दिया… आस्था का चरम इस कदर पहुंचा दिया कि नगर सरकार का भी सेहरा उन्हीं के सर बांध दिया… लेकिन दो नहीं तीन-तीन इंजन की सरकार का मदहोश ट्रक अपनी मदस्त गति से हमारे जीवन को रौंदता हुआ चीखों में झोंकता हुआ… खून में सराबोर करता हुआ… एक लावारिस मौत की तरह सडक़ को ही श्मशान बनाता हुआ… बिना चिता के ही दाह संस्कार की अंतिम क्रिया का विनाशक बन गया… एक हृदय विदारक चीखों से गूंजते शहर के रुदन में सवाल नहीं बवाल मचा हुआ है… हमने जिन्हें विश्वास सौंपा… जिन्हें ताकत सौंपी, जिन्हें जिम्मेदार बनाया उन्होंने इस शहर में अव्यवस्थाओं का यह कैसा तांडव रचाया… शहर में दो-दो मंत्री हैं, आठ-आठ विधायक हैं… महापौर की सरकार है… निगम की परिषद है… सच कहें तो यह सत्ताशाही नहीं लोकतंत्र नहीं … हमने तो राजतंत्र बना दिया… विपक्ष तक को मिटा दिया… वो जो कहे वो सही… वो जैसा सोचे वो सही… घटना पर दु:ख व्यक्त करते मंत्री कहते हैं कि हम दोषियों पर कार्रवाई करेंगे… लेकिन दोषी कौन है… दोषी तो आप ही हैं… आपकी सरकार ही है… आपका प्रशासन ही है… जिस शहर में यातायात के मुट्ठीभर जवान चौराहों पर बतियाती नजर आते हैं… जिस शहर में पुलिस शरीफों के मुंह सुंघती हो और दानवों को मदमस्ती के लिए छोड़ देती हो… जिस शहर में चालान केवल खजाना भरने के लिये वसूला जाता हो… जिस शहर में ट्रैफिक पर केवल बातें होती हो… जिस शहर में नेताओं से लेकर प्रशासन के अधिकारी बंद कमरे में चाय-समोसे के बीच गोष्ठियां करते हो… जहां जनता में जागरुकता फैलाई जाती हो… और जिम्मेदारों में मदहोशी नजर आती हो… वहां रक्त का तांडव और मौतों की चीखें सडकों को श्मशान बनाती हो… वहां दोषियों की खोज की बजाय यदि गिरेबां में झांका जाए तो नजर आएगा कि दिन में ट्रक इसलिए शहर में घुस आते हैं क्योंकि वो रात में भी पुलिस को पैसा खिलाते हैं… शहर में घुसा वो ट्रक चालक शराब के नशे में ही चूर नहीं था, बल्कि उसे इस बात का भी नशा था कि वो पुलिस को अपना खरीदा हुआ मानता है… तभी तो वो सडक़ को श्मशान बनाने की हिमाकत दिखाता है… तभी तो वो रौंदते हुए भागने की हिम्मत रखता है… तीन लोगों की मौत हो गई… सोचिए उस एक परिवार के ही बारे में जिसके परिजन उसके शव का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाएंगे… जिसकी चिता सडक़ों पर ही जल गई… क्या जवाब दे पाएंगे… इस शहर के लोग… इस शहर का पुलिस प्रशासन… इस शहर के नेता… इस शहर के मंत्री, विधायक और सांसद… शहर की सडक़ पर जली इस चिता पर चिंतन किया जाए… इस शहर के रुदन को समझा जाए… खुद की जिम्मेदारी को समझा जाए… पुलिस महकमे में विस्तार के साथ ही विश्वास का अहसास कराया जाए… अब और कोई जिंदगी सडक़ पर मौत का सामान नहीं बनेगी… दोषियों को ढूंढने और सजा देने की औपचारिकता बंद कर खुद की जिम्मेदारी को समझने का प्रयास किया जाए… वरना जनता खुद दोषी ढूंढ लेगी और सजा भी देने से नहीं चुकेगी…

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