
इंदौर। शहर की प्राचीन कृष्णपुरा छत्रियों के समीप स्थित भगवान दत्तात्रेय का मंदिर करीब 750 साल पुराना है । होलकर राजवंश के संस्थापक सूबेदार मल्हारराव होलकर के आगमन के भी कई वर्ष पहले से दत्तात्रेय मंदिर की स्थापना हो चुकी थी।
यह प्राचीन दत्त मंदिर भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र है। यहां वर्ष 1666 में आगरा से मुगल शासक औरंगजेब को चकमा देकर पुत्र के साथ दक्षिण जा रहे छत्रपति शिवाजी महाराज कुछ दिन यहां साधु वेश में रहे थे। शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास स्वामी ने यहां साधना कर पास ही खेड़ापति हनुमान की स्थापना की थी।
वहीं जगद्गुरु शंकराचार्य सहित कई साधु-संत पुण्य नगरी अवंतिका (वर्तमान में उज्जैन) जाने से पहले अपने अखाड़े के साथ इसी मंदिर के परिसर में रुका करते थे। यह मंदिर शहर के अस्तित्व में आने के पहले से स्थापित है। मंदिर की मौजूदगी की जानकारी होलकर रियासत के सूबेदार मल्हारराव होलकर के मालवा आगमन से पहले की दर्ज है।देवी अहिल्याबाई भी यहां दर्शन के लिए आती थीं। उस समय मंदिर के आसपास पीपल, बरगद और गूलर के घने पेड़ हुआ करते थे। दत्तात्रेय भगवान के इस मंदिर का जिक्र मराठीशाहीची बखर पुस्तक में भी है। लकड़ी से बने इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1896 में किया गया था। 40 बाय 100 वर्गफीट में बने वर्तमान मंदिर में भगवान दत्तात्रेय की तीन मुख वाली पाषाण मूर्ति विराजित है। पूर्व मुखी मंदिर के गुंबज की ऊंचाई 27 फीट है। मूर्ति के सामने प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। यहां करीब 150 शिवलिंग और शालिगराम हैं, जो भक्तों ने भेंट किए हैं।
वर्ष 1517 में आए थे गुरु नानकदेव महाराज
सिख पंथ के संस्थापक गुरु नानकदेव महाराज 504 साल पहले इंदौर, बेटमा और ओंकारेश्वर आए थे। उनके वर्ष 1517 में आने का उल्लेख पुरातन ग्रंथ गुरु खालसा में मिलता है। इस दौरान उन्होंने कान्ह नदी के किनारे आसन लगाया था। इस स्थान पर सिख समाज ने गुरुद्वारा इमली साहिब बनाया है। उसी दौरान दत्त मंदिर में भी उन्होंने साधु-संन्यासियों से धर्म चर्चा की थी। वे करीब तीन महीने इस स्थान पर रहे थे।
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