
डेस्क: पश्चिम एशिया में सुलग रही युद्ध की आग अब पूरी दुनिया को झुलसाने के लिए तैयार है. इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रही तनातनी ने अब एक ऐसा खतरनाक मोड़ ले लिया है, जिसका सीधा असर रसोई की गैस से लेकर घर के बिजली बिल तक पड़ने वाला है. हाल ही में इजराइल ने ईरान की युद्ध नीति तैयार करने वाले अली लारीजानी समेत तीन बड़े अधिकारियों को निशाना बनाया था. इस कदम से बौखलाए ईरान ने बेहद आक्रामक पलटवार करते हुए 9 अरब देशों में जबरदस्त हमले किए हैं. इस बार ईरान के निशाने पर कोई सैन्य ठिकाना नहीं, बल्कि सीधे तौर पर एनर्जी फील्ड्स (ऊर्जा केंद्र) रहे हैं. इनमें सबसे अहम नाम कतर के ‘रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी’ का है. इस एक शहर पर हुए हमले ने पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला की नींद उड़ा दी है.
ईरान का यह कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था पर एक बड़ा प्रहार है. कतर का ‘रास लफान’ केवल एक इंडस्ट्रियल एरिया नहीं, बल्कि ग्लोबल एनर्जी सप्लाई का धड़कता हुआ दिल है. ऊर्जा संयंत्रों को निशाना बनाने का सीधा मतलब है कि दुनिया भर में आवश्यक ईंधनों की आपूर्ति को रोक देना. मिसाइल हमलों से हुए नुकसान की खबरें आ रही हैं और गैस प्रोसेसिंग जैसे जटिल इंफ्रास्ट्रक्चर को हुए किसी भी डैमेज को पूरी तरह ठीक करने में महीनों का समय लग सकता है.
यह समझना बेहद जरूरी है कि यह शहर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ क्यों माना जाता है. रास लफान दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी (LNG) एक्सपोर्ट टर्मिनल है. यह अकेला शहर पूरी दुनिया की कुल एलएनजी सप्लाई में 20 फीसदी का योगदान देता है. यहां दुनिया के सबसे बड़े गैस भंडार ‘नॉर्थ फील्ड’ से आने वाली प्राकृतिक गैस को प्रोसेस किया जाता है. इसकी वर्तमान क्षमता 77 मिलियन टन प्रति वर्ष है, जिसके भविष्य में 126 एमटीपीए से अधिक होने की उम्मीद है. बात सिर्फ गैस तक सीमित नहीं है. यहां से 12 मिलियन टन से ज्यादा एलपीजी (LPG) का निर्यात होता है. इसके अलावा 2.9 लाख बैरल कंडेनसेट की रोजाना प्रोसेसिंग, 2730 मेगावाट बिजली का उत्पादन, पानी साफ करने के विशाल प्लांट और दुनिया का लगभग 25 प्रतिशत हीलियम भी यहीं तैयार होता है.
जानकारों का मानना है कि अगर यहां उत्पादन लंबे समय तक बाधित रहता है, तो यह केवल एक अस्थाई संकट नहीं, बल्कि एक ‘स्ट्रक्चरल सप्लाई शॉक’ में बदल जाएगा. रास लफान में रुकावट का मतलब है एशिया और यूरोप के देशों में गैस की भारी किल्लत. पहले से ही युद्ध के तनाव से जूझ रहे अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतें आसमान छूने लगेंगी. इसका असर यह भी हो सकता है कि ऊर्जा संकट से बचने के लिए यूरोपीय देश एक बार फिर रूसी गैस की ओर लौटने को मजबूर हो जाएं, जिससे उन्होंने यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से सख्त दूरी बना ली थी.
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर एलएनजी आयात पर निर्भर है, जिसमें कतर हमारा एक प्रमुख साझीदार है. जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सप्लाई घटेगी, तो जाहिर है कीमतें बेतहाशा बढ़ेंगी. इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ेगा. आम आदमी के नजरिए से देखें तो महंगी गैस का मतलब है बिजली उत्पादन और उद्योगों की लागत में भारी वृद्धि. इससे देश में महंगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है. पेट्रोलियम उत्पादों से लेकर रोजमर्रा की तमाम चीजें महंगी हो सकती हैं.
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