
इंदौर. टोरी कॉर्नर (Tory Corner) से मारल क्लब (Maral Club) की गेर के साथ शुरुआत हुई। हजारों लोग रंग-गुलाल (color and gulal) उड़ाते हुए जुलूस में शामिल हुए और टैंकरों से रंगीन पानी की बौछार की जा रही है। जुलूस आगे बढ़ते हुए गोराकुंड चौराहा और फिर राजवाड़ा क्षेत्र की ओर जा रहा है, जहां बड़ी संख्या में लोग जमा हैं।
इस आयोजन में हर साल लाखों लोग शामिल होते हैं और यह इंदौर की सबसे बड़ी रंग यात्रा मानी जाती है। इसकी शुरुआत 1948 में हुई थी और आज यह शहर की प्रमुख सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।
इंदौर की गेर से जुड़ी आज की प्रमुख अपडेट्स और इसके इतिहास पर एक नज़र:
प्रारंभ: सुबह लगभग 9:30 – 10:00 बजे से विभिन्न संस्थाओं की गेर निकलना शुरू हुई। सबसे पहली गेर पारंपरिक रूप से टोरी कॉर्नर से निकली, जो करीब 11:15 बजे राजवाड़ा पहुंची।
प्रमुख आकर्षण: ‘मिसाइलों’ और बड़े टैंकों से गुलाल और रंगीन पानी की बौछारें की जा रही हैं। पूरा राजवाड़ा क्षेत्र रंगों के बादलों से ढका हुआ है।
विशेष व्यवस्था: इस बार प्रशासन ने छतों से गेर देखने के लिए सशुल्क (Paid) टिकट की व्यवस्था भी की है, ताकि लोग सुरक्षित तरीके से इस नजारे का लुत्फ उठा सकें।
सुरक्षा: करीब 2500 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात हैं और ड्रोन के जरिए भीड़ की निगरानी की जा रही है।
गेर का ऐतिहासिक महत्व
इंदौर की गेर सिर्फ एक जुलूस नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक धरोहर है:
होलकर कालीन परंपरा: इसकी शुरुआत होलकर राजवंश के समय हुई थी। उस दौर में रियासत के राजा खुद आम जनता के साथ होली खेलने निकलते थे, जिससे ऊंच-नीच का भेद खत्म होता था।
सामाजिक समरसता: ‘गेर’ शब्द का एक अर्थ ‘गैर’ (पराया) भी माना जाता है, यानी इस दिन कोई पराया नहीं होता, सब एक ही रंग में रंगे होते हैं।
UNESCO की दौड़ में: इंदौर की इस पारंपरिक गेर को यूनेस्को (UNESCO) की ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल कराने के प्रयास भी पिछले कुछ वर्षों से जारी हैं।
प्रमुख मार्ग (Route)
गेर मुख्य रूप से इन क्षेत्रों से होकर गुजरती है:
टोरी कॉर्नर ➔ गोराकुंड ➔ खजूरी बाजार ➔ राजवाड़ा ➔ सराफा ➔ इतवारिया बाजार।
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