
गोड़से (Godse) की गोली ने गांधी (Gandhi) को अमर बना दिया… यह तो गनीमत है कि वो किंग नहीं किंगमेकर (Kingmaker) बने… यदि उन्होंने सत्ता को चुना होता तो वो भी आज उसी तरह कोसे जाते, जिस तरह नेहरू पर लोग उंगली उठा रहे हैं… इंदिराजी (Indira ji) पर तोहमतें लगा रहे हैं… राजीव के बलिदान को मिटा रहे हैं और यह भी भूले जा रहे हैं कि वो आज उंगली उठाएंगे तो कल उन पर भी लोग सवालों की तोपें चलाएंगे… उनके भी कामों को बदनामी में मिलाएंगे… उनके चाल-चरित्र, आचार-विचार, हौसले और साहस को भी मिट््टी में मिलाएंगे… गांधी-नेहरू का युग आज की पीढ़ी ने देखा नहीं… तब की यातनाएं और गुलामी किसी ने सही नहीं… तब की जरूरतें और जिल्लतें किसी ने ढोई नहीं… अंग्रेजों के जुल्म और जुर्म ऐसा कहर ढाते थे कि लोग नजरें नहीं उठा पाते थे… तब कोई सुभाष बना, कोई भगतसिंह… किसी ने बंदूक उठाई तो किसी ने बम बरसाए… कोई फांसी चढ़ा तो कोई गोलियों से भूना गया… तब शहादत इबादत कहलाती थी… तब मुफलिसी ताकत समझी जाती थी… तब जेल की कोठरियां स्वाभिमान की याद दिलाती थीं… ऐसे में गांधी की संयम की विचारधारा… लाठी की मर्यादा, प्रदर्शन, आंदोलन, उपवास की इबादतें देश में जंगे-आजादी का नया पैगाम लाई और अंग्रेजों के सामने झुकने और टूटने की मजबूरी बन आई…सुभाषचंद्र बोस की सेना और भगतसिंह के साथियों के सामने सर झुकाना अंग्रेजों को मुनासिब नहीं लगा तो गांधीजी के आंदोलन को तरजीह मिली और वो इस देश के बापू बन गए… गांधी का समर्पण और त्याग आजादी तो लाया, लेकिन आजाद हिंदुस्तान को संभालने का जोखिम भी जंगे-आजादी से भारी नजर आया… हर कोई सत्ता पाना चाहता था और इसी जंग में देश का बंटवारा हो गया…गांधीजी के संयम ने सत्ता से किनारा कर नेहरू को मुखिया बनाया…आजादी के सिपाही पटेल सहित सारे नेताओं को उनका कांधा थमाया… जिन कांधों पर चढक़र देश ने मुकाम पाया, आज के सियासतदारों ने उन कांधों को ही बांट दिया… वो पटेल को पूजते हैं…नेहरू को कोसते हैं…उनसे सवाल पूछते हैं कि उन्होंने देश के लिए क्या किया… जिस देश के पास अलग हुए पाकिस्तान को देने के लिए 75 लाख रुपए नहीं थे उस देश के करोड़ों लोग यदि आज अरबपति हैं तो सोच लेना चाहिए कि हमने क्या किया और उन्होंने क्या दिया…वो तो गांधी सत्ता में नहीं थे और गोड़से की गोली ने उन्हें अमर कर दिया, वरना लोग आज उनकी तिथि को भी पुण्य नहीं मानते…गांधी का दस्तूर निभाने वाले बाला साहब ठाकरे पूजे जाते हैं, लेकिन सत्ता में आने वाले उनके पुत्र उद्धव लानतों में रौंदे जाते हैं…गांधीजी की पुण्यतिथि तब और अब की राजनीति के बदलाव पर चिंतन करने का मुकाम बन सकती है… यह जरूरत जनता की नहीं देश चलाने वालों की है, वरना नेता तो होंगे, मगर उनकी यादें नहीं रहेंगी…
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