
नई दिल्ली: राजनीति में कोई भी कहानी अंतिम नहीं होती और दरवाजे अक्सर वहीं खुलते हैं, जहां वे बंद दिखते हैं. गांधी परिवार (Gandhi Family) के दूसरे खेमे के वारिस वरुण गांधी (Varun Gandhi) की चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) से दूरियों के लिए होती रही है. लेकिन मंगलवार को वरुण की सपरिवार उनसे मुलाकात और एक्स पर फोटो सहित पोस्ट में प्रधानमंत्री की उन्मुक्त प्रशंसा ने राजनीतिक क्षेत्रों में हलचल मचाई है.
वरुण की भाजपा में आगे क्या भूमिका होगी, इस पर फिलहाल सिर्फ अटकलें लगाई जा सकती हैं. लेकिन पार्टी की ओर से इसे बड़ा संकेत माना जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा असहमति के स्वरों के लिए भी अपने दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं करती.
दूरियों के बीच भी 2019 तक पार्टी ने दिया टिकट
वरुण गांधी तीन बार भाजपा से सांसद रहे हैं. 2009 में पहली बार वे पीलीभीत से लोकसभा के लिए चुने गए. पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रखा. महामंत्री के तौर पर पश्चिम बंगाल का प्रभार दिया. 2014 में वरुण ने पीलीभीत की जगह सुल्तानपुर को अपना निर्वाचन क्षेत्र बनाया. वहां से भी जीत दर्ज की. यही साल था जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी की अगुवाई में जबरदस्त जीत हासिल कर केंद्र में पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई.
इस चुनाव के समय से ही वरुण की नए नेतृत्व से दूरियां उजागर होने लगीं थीं. अगले कुछ दिनों में वरुण पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त होते गए. बावजूद इसके 2019 में पार्टी ने मां-बेटे मेनका और वरुण को केवल लोकसभा का टिकट ही नहीं दिया बल्कि सीटों की एक-दूसरे से अदला-बदली की भी इजाजत दी. 2019 में मेनका ने सुल्तानपुर से और वरुण ने पीलीभीत से विजय प्राप्त की थी.
विरोधी बयानों की पार्टी ने की अनदेखी
भाजपा सांसद के तौर पर वरुण गांधी का 2019-24 का तीसरा कार्यकाल नेतृत्व और पार्टी से उनकी बढ़ती दूरियों के लिए याद किया जाता है. प्रायः अपने बयानों से वे पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा करते रहे. रोहित वेमुला से किसान आंदोलन जैसे कई सवालों पर उनका स्टैंड पार्टी के लिए परेशानी तो विपक्ष के लिए तसल्ली की वजह बना . एक ओर वे भाजपा की सरकारों और उसके नेतृत्व को वे घेरते रहे तो दूसरी ओर प्रतिद्वंद्वियों की जब-तब उनके मुख से प्रशंसा बताती रही कि पार्टी से उनके रिश्ते किस मुकाम पर हैं.
दिलचस्प है कि भाजपा नेतृत्व ने उनके बयानों पर ठंडा रुख अपनाए रखा. उनके विपरीत मेनका गांधी ने 2019 में केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह न मिलने पर भी अपेक्षाकृत संतुलित – संयमित रवैया अपनाया. 2024 में पार्टी ने वरुण को टिकट से वंचित कर दिया. मेनका को सुल्तानपुर से एक बार फिर टिकट मिला. हालांकि वे यह चुनाव हार गईं .
टिकट कटने के बाद रहे खामोश
वरुण की भाजपा से बढ़ती दूरियों के बीच उनके अगले राजनीतिक पड़ाव को लेकर चर्चाएं चलती रहीं. 2024 के लोकसभा चुनाव के पूर्व केदारनाथ धाम में राहुल गांधी से उनकी एक मुलाकात के बाद परिवार के दोनों खेमों के मिलन को लेकर खूब अटकलें लगीं. लेकिन जहां तक राहुल का सवाल था उन्होंने साफ कर दिया कि वे उनसे गले तो मिल सकते हैं लेकिन हमारी विचारधारा अलग है.
टिकट से वंचित होने के बाद वरुण ने आमतौर पर खामोशी अख्तियार रखी. फिर भी उनके अगले राजनीतिक कदम को लेकर अटकलें लगती रहीं. माना जाता है कि राहुल के मुकाबले प्रियंका से वरुण के रिश्ते बेहतर हैं. पिछले कुछ दिनों से गांधी परिवार के पारिवारिक क्षेत्र अमेठी के कुछ कांग्रेसी जिन्हें प्रियंका से मिलने का मौका मिलता रहा है, सोशल मीडिया पर वरुण के कांग्रेस के नजदीक आने के कयासों की पोस्ट डालते रहे.
प्रधानमंत्री से सपरिवार मुलाकात ने चौंकाया
वरुण ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सपरिवार मुलाकात करके लोगों को चौंकाया. इस मुलाकात को उन्होंने बेहद खास बताते हुए एक्स पर लिखा कि अपने परिवार के साथ आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने और उनका आशीर्वाद व मार्गदर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य मिला. यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है और इससे मेरा यह विश्वास और मजबूत हुआ है कि प्रधानमंत्री देश और जनता के सच्चे संरक्षक हैं. यह मुलाकात कितनी गर्मजोशी भरी रही, यह वरुण गांधी का आगे का कथन बताता है, आपके आभामंडल में पिता समान स्नेह और संरक्षण का भाव है. आपसे हुई भेंट इस विश्वास को और भी दृढ़ बना देती है कि आप देश और देशवासियों के सच्चे अभिभावक हैं.
मुलाकात की टाइमिंग खास
राजनीति में ऐसी मुलाकात की तस्वीरों और टाइमिंग का अलग ही महत्व होता है. वरुण की लंबे समय से पार्टी से दूरी. 2024 के लोकसभा चुनाव में टिकट से वंचित रहना. फिर लगातार खामोशी. अगले कदम को लेकर अटकलें. फिर अचानक नरेंद्र मोदी से सपरिवार मुलाकात. इसे महज एक सामान्य शिष्टाचार भेंट नहीं मानी जा सकती. इसके साथ साझा की गई तस्वीर और उसमें मोदी को पितृ पुरुष बताने वाला भाव, राजनीति के गहरे संदेशों की ओर इशारा करता है. वरुण की भीड़ खींचने की क्षमता से इनकार नहीं किया जा सकता.
पश्चिम बंगाल जहां भाजपा का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है, वहां के वरुण प्रभारी रह चुके हैं. असम में तीसरी बार सत्ता में आने के लिए भाजपा ने पूरा जोर लगा रखा है. उत्तर प्रदेश के 2027 के विधानसभा चुनाव भी बहुत दूर नहीं हैं. जो भी वजहें हों लेकिन टिकट से वंचित होने और असहमतियों के बाद भी वरुण भाजपा में बने रहे हैं. अगर पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव प्रचार में पार्टी वरुण को सक्रिय करती है तो माना जायेगा कि बर्फ़ पिघल चुकी है.
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