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West Asia tensions: तेल संकट के बीच भारत ने बदली आयात रणनीति, अफ्रीका समेत इन देशों से बढ़ाई कच्चे तेल की खरीद

March 09, 2026

नई दिल्ली. पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों (ships) की आवाजाही पर बढ़ते खतरे के बीच भारत (India) ने अपनी तेल आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए बड़ा कदम उठाया है। भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने अब अमेरिका, लैटिन अमेरिका, रूस और पश्चिम अफ्रीका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है। इसका उद्देश्य देश में ईंधन की आपूर्ति को स्थिर रखना और किसी संभावित संकट से बचाव करना है।

ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों के अनुसार भारतीय रिफाइनरियों ने अपनी खरीद रणनीति में बदलाव किया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज, एचपीसीएल और एचपीसीएल-मित्तल एनर्जी लिमिटेड जैसी कंपनियों ने पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका और लैटिन अमेरिका के साथ-साथ रूस से भी अतिरिक्त कच्चा तेल खरीदना शुरू कर दिया है। अमेरिका की ओर से रूसी तेल के लिए दी गई 30 दिन की अस्थायी छूट ने भी भारत के लिए तेल आयात का एक नया रास्ता खोल दिया है।


  • गैर-होर्मुज स्रोतों से तेल आयात क्यों बढ़ाया गया?
    पेट्रोलियम मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार भारत अब ऐसे क्षेत्रों से अधिक तेल खरीद रहा है जो मौजूदा संघर्ष के दायरे से बाहर हैं। इसका असर यह हुआ कि गैर-होर्मुज स्रोतों से आने वाले तेल की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 70 प्रतिशत हो गई है। वर्ष 2025 में यह आंकड़ा लगभग 60 प्रतिशत था। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए आपूर्ति के कई स्रोत बनाए रखना जरूरी माना जा रहा है।

    भारत के पास अभी कितना तेल भंडार है?
    पेट्रोलियम मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार देश के पास फिलहाल करीब 14.4 करोड़ बैरल कच्चे तेल का भंडार मौजूद है। यह भंडार लगभग 50 दिनों की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है। इसके अलावा सामरिक पेट्रोलियम भंडार में भी करीब 9.5 दिनों की शुद्ध आयात जरूरतों को पूरा करने लायक कच्चा तेल सुरक्षित रखा गया है।

    सरकारी कंपनियों के पास कुल कितना भंडार है?
    सरकारी तेल कंपनियों के पास भी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा भंडार मौजूद है। अधिकारियों के अनुसार इन कंपनियों के पास करीब 64.5 दिनों की शुद्ध आयात जरूरतों के बराबर भंडार है। सामरिक भंडार को जोड़कर देखा जाए तो देश के पास कुल मिलाकर लगभग 74 दिनों की जरूरतों को पूरा करने लायक तेल उपलब्ध है।

    वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?
    ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसी बीच कुवैत ने एहतियात के तौर पर तेल उत्पादन और रिफाइनिंग में कटौती की घोषणा की है। इस स्थिति के कारण एक सप्ताह में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 35 प्रतिशत तक उछाल दर्ज किया गया है।

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