
डेस्क: मिडिल ईस्ट के अधिकांश देशों पर कूटनीतिक प्रभाव होने के बावजूद, पिछले 47 वर्षों से अमेरिका (America) की खास निगाह ईरान (Iran) पर बनी हुई है. ईरान को कंट्रोल करने के लिए 1979 के बाद से अमेरिका ने कई कवायद की, लेकिन उसे सफलता नहीं मिल पाई. यही वजह है कि इस बार के विरोध प्रदर्शन (Protest) को लेकर अमेरिका ज्यादा सतर्क है. प्रदर्शनकारियों के साथ देने की अपील के बावजूद अमेरिका ईरान में एंट्री के मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है. अमेरिका के लिए ईरान 2 मायनों में काफी अहम है. एक तो ईरान पर कंट्रोल करके अमेरिका दुनियाभर के इस्लामिक कट्टरपंथ को झटका देना चाहता है. दूसरा ईरान पर अगर उसका कंट्रोल होता है तो दुनिया के व्यापार का वो 20 प्रतिशत हिस्से पर कंट्रोल कर लेगा.
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण चोकपॉइंट है, जिस पर फिलहाल ईरान का कंट्रोल है. ईरान अगर नहीं चाहेगा तो यहां से कोई भी जहाज नहीं गुजर सकता है. होर्मुज स्ट्रेट ही फारस की खाड़ी से खुले समुद्र तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता है. दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का 25% और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) व्यापार का 20% सालाना होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है.
एक अनुमान के मुताबिक हर दिन लगभग 20 मिलियन बैरल तेल होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है. यह रोजाना होने वाले ग्लोबल प्रोडक्शन का पांचवां हिस्सा है. ईरान होर्मुज स्ट्रेट के उत्तरी हिस्से को नियंत्रित करता है, जो इसकी सीमा से लगती है. जून 2025 में जब अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था, तो उस वक्त ईरान ने होर्मुज के नीचे बारूद बिछवा दिया. इसकी वजह से आनन-फानन में अमेरिका को सीजफायर करना पड़ा.
साल 1953 में ईरान में अमेरिकी खुफिया एजेंसी के एजेंटों ने मोहम्मद मोसदेग की चुनी हुई सरकार का तख्तापलट करवा दिया. इसके बाद ईरान में शाह वंश का शासन स्थापित हुआ, जो अमेरिका के इशारों पर ही काम कर रहा था. ईरान पर शाह वंश के जरिए अमेरिका का 26 साल तक कंट्रोल रहा. 1978 के आसपास अली खुमैनी के नेतृत्व में ईरान में इस्लामिक क्रांति की शुरुआत हुई, जिसके बाद शाह वंश का पतन हो गया. शाह वंश के जाते ही ईरान में इस्लामिक गणराज्य वापस आ गया. खुमैनी के बाद अयातुल्लाह अली खामेनेई को ईरान की सत्ता मिली.
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