
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में ‘पसमांदा मुसलमानों’ (‘Pasmanda Muslims) को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी के तहत नौकरियों (Jobs) और शैक्षणिक (Educational Institutions) संस्थानों (Reservation) में आरक्षण देने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कई अहम सवाल उठे। अदालत ने मुसलमान समुदाय के भीतर मौजूद अन्य पिछड़े वर्गों का विस्तृत ब्योरा तलब किया और पूछा कि क्या पसमांदा ही सांख्यिकीय रूप से एकमात्र पिछड़ा वर्ग हैं।
प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता मोहम्मद वसीम सैफी का प्रतिनिधित्व कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना प्रकाश से पूछा, ‘अन्य मुस्लिम ओबीसी के बारे में क्या? ओबीसी होना केवल एक सामाजिक स्थिति का कारक नहीं है, बल्कि एक आर्थिक कारक भी है।’
इस जनहित याचिका में रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट की सिफारिश के अनुसार ओबीसी को उप-वर्गीकृत करके पसमांदा मुसलमानों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का अनुरोध किया गया था।
CJI ने पूछे सवाल
सीजेआई ने कहा, ‘अन्य गरीब मुसलमानों की कीमत पर, आप केवल पसमांदा को बढ़ावा देना चाहते हैं… कुल कितने मुसलमान पिछड़े हुए हैं, इस पर आपने कोई अध्ययन क्यों नहीं किया?’
वकील ने जवाब दिया
वरिष्ठ वकील अंजना प्रकाश ने कहा कि वह सवालों के जवाब में एक नोट दाखिल करेंगी। इसके बाद पीठ ने याचिका को चार सप्ताह बाद दोबारा सूचीबद्ध करने का आदेश दिया। प्रकाश ने शुरुआत में ही पीठ से आग्रह किया कि वह जनहित याचिका को आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के तहत चार प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के मुद्दे से संबंधित एक अन्य लंबित मामले के साथ जोड़ दे। वरिष्ठ वकील ने कहा कि ‘पसमांदा’ मुसलमान गरीब हैं और उन्हें ओबीसी श्रेणी के तहत आरक्षण लाभ प्राप्त करने का अधिकार है।
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