इंदौर न्यूज़ (Indore News)

150 निजी स्कूलों में डल गए ताले

किराया भाड़ा- वेतन व अन्य खर्चे कोरोना के चलते अब नहीं भुगत सकते…
इन्दौर। एक तरफ निजी स्कूलों पर लगातार दबाव है कि वह फीस ना ले, जिसके चलते पालकों का तो विरोध है ही, वहीं कोर्ट-कचहरी भी चल रही है और नेताओं द्वारा भी इसका विरोध किया जा रहा है। दूसरी तरफ शहर के 150 निजी स्कूलों पर ताले गए हैं, क्योंकि कोरोना के चलते जहां लगातार स्कूल बंद हैं, वहीं किराया, वेतन, कर सहित अन्य खर्चा संचालक अब बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं, जिसके चलते स्कूल बंद करने का फैसला लेना पड़ा। इनमें पढऩे वाले डेढ़ हजार से अधिक बच्चे अवश्य संकट में आ जाएंगे।
हर साल शिक्षा विभाग नए निजी स्कूलों का जहां पंजीयन करता है, वहीं पुराने स्कूलों की मान्यता को भी जारी रखा जाता है। कई स्कूलों को विभिन्न कारणों के चलते नोटिस भी थमाए जाते हैं, जिनकी मान्यता रोकी जाती है। फिर दबाव-प्रभाव के चलते नया शिक्षण सत्र शुरू होते ही बहाल कर दी जाती है। अभी कोरोना के चलते मार्च के अंतिम दिनों से ही सभी स्कूल-कॉलेज और अन्य शैक्षणिक संस्थाएं बंद हो गई और अभी नए आदेश के चलते 31 अगस्त तक इन संस्थाओं को बंद रखने का ही निर्णय लिया गया है। स्कूलों द्वारा ऑनलाइन क्लास अवश्य ली जा रही है, जिसके चलते पालकों ने लगातार मांग की कि वे सिर्फ शैक्षणिक शुल्क ही देंगे। अन्य तरह का कोई शुल्क नहीं चुकाया जाएगा। इसको लेकर लगातार विरोध-प्रदर्शन, कोर्ट-कचहरी भी चलती रही है। शहर में हजारों की संख्या में निजी स्कूल चल रहे हैं, जिनमें बड़े स्कूलों की तो आर्थिक स्थिति बेहतर है, लेकिन गली-मोहल्ले, कालोनियों में चलने वाले कई निजी स्कूलों की हालत कोरोना ने खस्ता कर दी है। इनमें अधिकांश स्कूल किराए के भवनों में चलाए जा रहे हैं। अभी बंद के कारण स्कूल संचालकों को फीस भी नहीं मिल रही और उन्हें किराया भरना पड़ रहा है। इसके अलावा सम्पत्ति कर, जल कर, बिजली के भारी-भरकम बिल, बैंकों की किश्तें और स्टाफ का वेतन भी चुकाना पड़ रहा है। नतीजतन 150 निजी स्कूल ऐसे हैं जिन्होंने अब स्थायी रूप से ताले लगाने का निर्णय ले लिया है। इंदौर में डेढ़ हजार से अधिक निजी स्कूल हैं, जिन्हें बोर्ड द्वारा मान्यता दी जाती है, लेकिन इस बार अभी 150 निजी स्कूल मान्यता भी नहीं लेंगे। इनके संचालकों का कहना है कि अब खर्चा बर्दाश्त करना संभव नहीं है, क्योंकि आने वाले कई महीनों तक पालक अपने बच्चों को स्कूल भेजेंगे नहीं, भले ही सरकार खोलने की अनुमति दे दी। यह पूरा शिक्षण सत्र तो चौपट हो ही गया है। ऐसे में अब स्कूलों का संचालन करना उनके बूते की बात नहीं है। हालांकि इस चक्कर में डेढ़ हजार से अधिक वे बच्चे भी प्रभावित होंगे जो इन स्कूलों में पढ़ते हैं। उन्हें अब अन्य निजी स्कूलों में एडमिशन लेना पड़ेगा। इन निजी स्कूलों में कुछ सीबीएसई, तो कुछ स्टेट बोर्ड से सम्बद्ध भी हैं। हर साल नए शिक्षण सत्र में इन स्कूलों को नए विद्यार्थी भी मिल जाते हैं, लेकिन इस बार कोरोना के चलते नए एडमिशन भी नहीं हो सके, जिसके चलते ये स्कूल संचालक जबरदस्त वित्तीय संकट में फंस गए हैं और मजबूरन उन्हें अब स्कूल बंद करने का ही निर्णय लेना पड़ रहा है। दूसरी तरफ शहर में जो निजी बड़े स्कूल हैं उनकी तो कमाई सालाना करोड़ों रुपए होती है, जो भारी-भरकम फीस से लेकर अन्य तरह के शुल्क पालकों से वसूलते हैं और स्कूल यूनिफॉर्म, किताबें और अन्य सामग्री बेचकर भी मोटी कमाई की जाती है। हालांकि इन बड़े स्कूलों द्वारा भी अपने स्टाफ को 50 से 70 प्रतिशत ही वेतन दिया जा रहा है।

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