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इंदौर में टीबी के 261 मरीज एड्स की चपेट में

April 03, 2022

दो-दो जानलेवा बीमारियों से जंग लड़ रहे मरीज

कई मरीज तीन बीमारियों से जूझ रहे

इंदौर। टीबी (TB)  की बीमारी के इलाज के लिए की गई मेडिकल जांचों (medical examinations) के दौरान  खुलासा हुआ कि इंदौर जिले में 250 से ज्यादा ऐसे मरीज हैं, जो दो-दो जानलेवा बीमारियों से दोहरी जंग लड़ रहे हैं। किसी को टीबी की बीमारी थी तो वो कुछ दिनों बाद एड्स (AIDS) की या फिर कोई एड्स (AIDS) से पीडि़त था तो टीबी (TB) के चपेट में आ चुका है ।

पिछले साल 2021 के 12 महीने में एमडीआर टीबी के 61 नए मरीज सामने आए हैं, जबकि पिछले साल टीबी के 8000 नए मरीज मिले।  इतना ही नहीं, कई मरीज तो ऐसे भी सामने आए, जो एड्स प्लस टीबी सहित डायबिटीज, यानी तीन-तीन बीमारियों के शिकंजे में फंसे हुए हैं। एक साथ दो गंभीर बीमारियों से सामना कर रहे लोगों पर 6 महीने में सरकार इलाज सहित सभी मेडिकल जांचों पर प्रतिव्यक्ति 18  लाख रुपए से ज्यादा खर्च कर रही है।


  • सामान्य टीबी और एड्स पर 2 लाख रुपए

    सरकारी रिकार्ड के अनुसार  सामान्य टीबी और एड्स के मरीजों पर 6 माह में  सरकार लगभग 2 लाख रुपए का खर्च उठाती है। एड्स के मरीजों को जहां एटीआर मेडिसिन दी जाती है तो वहीं एमडीआर टीबी वालों को बेडाक्वलिन टेबलेट के अलावा 6 अन्य दवाइयां भी दी जाती हैं। एमडीआर टीबी प्लस एड्स के एक मरीज की जांच व इलाज पर लगभग 18 लाख रुपए तक खर्च करती है।

    नि:क्षय योजना से 500 रुपए प्रतिमाह

    एमडीआर टीबी में मरीजों के लिए कम से कम 6 माह तक इस्तेमाल की जाने वाली 180 बेडाक्वलिन टेबलेट का बाजार मूल्य 13 लाख 80 हजार रुपए है। एमडीआर टीबी मरीज का इलाज 18 महीने तक चलता है। इसका खर्च सरकार वहन करती है। इसके अलावा टीबी मरीज के स्वस्थ होने तक सरकार नि:क्षय पोषण योजना के अंतर्गत 500 रुपए महीना देती है।

    तीन बीमारियों वाले मरीज भी

     डायबिटीज से पीडि़त अधिकांश मरीज टीबी की चपेट में जल्दी आ जाते हैं, क्योंकि डायबिटीज पीडि़तों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, इसलिए इन्हें टीबी होने का ज्यादा खतरा बना रहता है। डायबिटीज व टीबी मरीजों की तो प्रतिरोधक क्षमता सिर्फ कमजोर होती है, मगर एचआईवी यानी एड्स पीडि़तों की तो प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह खत्म ही हो जाती है।

     मल्टी ड्रग टीबी प्लस एड्स के साइड इफेक्ट

    जिनको एमडीआर टीबी प्लस एड्स हो जाता है, ऐसे मरीजों को कई शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस दौरान इन मरीजों के फेफड़े, पेट, रीढ़ की हड्डियों सहित आंतों में पानी भर जाता है। फेफड़े  और आंतें गलने लगती हैं। बदन का वजन लगातार कम होने लगता है, भूख नहीं लगती है।

    एमडीआर टीबी कब होती है

    एमडीआर टीबी तब होती है, जब सामान्य टीबी का मरीज नियमित दवाइयां नहीं लेता है या फिर वह टीबी होने के बाद इलाज के दौरान शराब, बीड़ी, सिगरेट, गांजा या अन्य नशे से परहेज नहीं करता है। तब वह एमडीआर टीबी के शिकंजे में फंस जाता है, जिसका 8 महीने से लेकर 18 महीने तक निरंतर इलाज चलता है।

    एमडीआर टीबी या फिर एचआईवी  की बीमारी हो, इसके मरीजों को ठीक होने तक इनकी सारी जांचें व हर इलाज सरकार मुफ्त में करवाती है। मरीज को सिर्फ  दवाइयों का लगातार सेवन करना चाहिए। इस दौरान  यदि शराब, बीड़ी, सिगरेट, गांजा, भांग का नशा नहीं करते हैं तो यह 100 प्रतिशत स्वस्थ हो सकते हैं।

    डॉक्टर राहुल श्रीवास्तव, जिला क्षय अधिकारी एवं एड्स नोडल सहअधिकारी

    साल  मरीज

    2017  67

    2018  44

    2019  57

    2020  32

    2021  61

    कुल  261

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