
गरीब (Poor) की दुकान… नेता पहलवान (Leader wrestler)… बाप-दादा के जमाने में सराफे (saraaphe) के एक कोने से शुरू हुई चाट-पकौड़ी की दुकान उस वक्त उन खाली पेट मजदूरों के पेट भरने का साधन थी, जो मिलों से मजदूरी कर लौटते थे और राजबाड़ा (raajabaada) की रातभर चालू रहने वाली दुकानों से होकर सराफा पहुंचकर बचे-खुचे पैसों से कुछ खाकर, कुछ बच्चों के लिए ले जाकर अपने परिवार की संतुष्टि करते थे… धीरे-धीरे मिलें बंद हुईं… मजदूर घटे, लेकिन शहरवालों ने चाट-चौपाटी को अपना लिया… हालांकि उसके चहेते वही मुफलिस, कम कमाने वाले, कम खर्च करने वाले मध्यम तबके के लोग रहे, जिन्हें सराफा की चौपाटी पर आने का गुमान इसलिए होता था कि वहां अमीर लोग भी लार टपकाते नजर आते थे… शहर के दोनों ही वर्गों की मिली-जुली इस चटोरी सल्तनत को राजसी स्वरूप देने के लिए नेताओं ने भी चहलकदमी करना शुरू कर दी और शहर में आने वाली विशिष्ट हस्तियों को सराफे की चाट-चौपाटी से रूबरू कराते हुए देशव्यापी प्रसिद्धि दिलाई… चौपाटी की इस विख्याती का बंटवारा तब हुआ, जब मॉडर्न सोसायटी के नाम पर छप्पन दुकान अवतरित हुई और उसके लिए जनता के आने-जाने की एक सडक़ को ही तबाह कर डाला गया… करोड़ों रुपए के सरकारी पैसों को बट्टा लगा दिया… बेलबूटे कराए… बैठने के साधन बनाए… धूप और गर्मी से बचने के लिए शेड लगाए… सुविधाघर बनाया, और न जाने क्या-क्या तामझाम जुटाकर चौपाटी का रूप दे डाला… कोई एक दुकानदार अपनी दुकान के आगे सडक़ पर दो फीट भी अतिक्रमण कर ले तो रौंद दिया जाता है, लेकिन यहां तो निगम पूरी एक सडक़ ही अतिक्रमण कर निगल गया एवं सडक़ मिटाने, हटाने के खिलाफ हाईकोर्ट तक लगी याचिका को खारिज कर दिया गया…उस चौपाटी को बनाने में पूरा महकमा साथ हो गया…उस सडक़ को चौपट करने के खिलाफ किसी ने भी साथ नहीं दिया… वहां पारंपरिक व्यंजन नहीं बनाए जाते हैं… नेता भी वहां पिज्जा-मोमोज से लेकर हॉटडॉग चाव से खाते हैं… वहां मेला लगता है… यहां ठेला लगाए जाने पर बवाल मचाया जाता है… वहां शाकाहारी के साथ मांसाहारी, यानी वेज-नॉनवेज दोनों जायके बेचे जाते हैं, लेकिन सराफे की चौपाटी पर निगाहें डालते सिंघम बने नेता पहुंच जाते हैं… दुकान बंद कराने के लिए धमकाते हैं…उन्हें भुट्टे का कीस और हॉटडॉग पारंपरिक व्यंजन नजर नहीं आते हैं…खुद चाइनीज खाएंगे… बच्चों को पिज्जा-पास्ता खिलाएंगे, लेकिन शहर को पारंपरिक व्यंजनों का पाठ पढ़ाएंगे…बदले वक्त में खानपान की परंपराएं बदली हैं…और बदली हुई परंपरा कुछ दिनों बाद पारंपरिक हो जाती है… पहले दीपावली पर बेसन की चक्की, पपड़ी, शकरपारे बनते थे… अब मध्यमवर्गीय भी कुछ बनाता नहीं, खरीद लाता है और गरीब जो मिल जाए वो खाकर निहाल हो जाता है, लेकिन नेताओं को पता नहीं क्यों लोगों का स्वाद परखने और बदलने में मजा आता है…नेतागीरी की ताकत वहां टें बोल जाती है, जब शहर में विदेशी दुकानें मैक्डोनाल्ड, डोमिनोज, पिज्जा हट खुल जाती हैं… जहां चौपाटी पर मिलने वाला 50 रुपए का पिज्जा 500 रुपए में बेचा जाता है… उन मल्टीप्लेक्स पर नजर नहीं जाती, जहां 20 रुपए का समोसा 250 रुपए में और 20 रुपए का पॉपकॉर्न 200 रुपए में बेचा जाता है…यह तो जनता की सडक़ है, जहां नेतागीरी हो जाती है… वो तो थिएटर का दरवाजा है, जहां नेताओं को भी बिना टिकट कटाए घुसने भी नहीं दिया जाता… सराफा की चौपाटी को लेकर जो निगम को करना चाहिए वो कुछ हद तक कर दिया…फैलती चौपाटी को सीमित कर दिया, लेकिन अब उन्हें सुविधा दिलाना…सुरक्षा बढ़ाना…परंपरा को वैभवशाली बनाना निगम और प्रशासन का कत्र्तव्य होना चाहिए, न कि नेतागीरी का तडक़ा लगाकर चौपाटी का स्वाद बिगाडऩा और छप्पन दुकान बनाने के लिए सराफा की चौपाटी को चौपट करने के मिजाज दिखाना…और हां, एक और बात, निगम ने सराफा की दुकानों से लेकर सडक़ों तक फैली चौपाटी को 69 दुकानों तक सीमित करने की सूची जारी कर दी… एक बार छप्पन दुकानों की भी गिनती कर लें, जहां आवंटित दुकानों के बाद कितनी अवैध दुकानें लगी हैं और कितनी दुकानें आवंटित दुकानों को तोडक़र बढ़ी हैं… सराफा चौपाटी के लिए तो बजाजखाना चौक में बना बहुमंजिला पार्किंग भी है, लेकिन छप्पन दुकान सडक़ घेरकर बनाई गई और उनकी पार्किंग भी यातायात का अवरोध कर सडक़ पर कराई जा रही है…
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