
भोपाल। मध्यप्रदेश की सरकारी नौकरियों में सबसे चर्चित मुद्दा ’27 फीसदी ओबीसी आरक्षण’ (OBC Reservation in MP) अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में कल (बुधवार) इस बहुप्रतीक्षित मामले पर अंतिम सुनवाई (Final Hearing) होने जा रही है। यह सुनवाई राज्य के लाखों युवाओं और कर्मचारियों के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट में कल क्या होगा?
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं ट्रांसफर कराए जाने के बाद, अब देश की सबसे बड़ी अदालत इस मामले की संवैधानिकता का परीक्षण करेगी। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई के लिए पूरी तरह तैयार है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी कि “राज्य के कानून की संवैधानिकता का अनुच्छेद 226 के तहत परीक्षण करने का प्राथमिक अधिकार हाईकोर्ट को है।” हालांकि, अब मामले के ट्रांसफर होने के बाद सबकी नजरें दिल्ली की ओर टिकी हैं।
क्यों अटका है मामला?
मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने का निर्णय कमलनाथ सरकार के समय लिया गया था, जिसे बाद में वर्तमान सरकार ने भी जारी रखा। हालांकि, यह मामला तब कानूनी पेचीदगियों में फंस गया जब इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कुल आरक्षण 50% की सीमा (इंदिरा साहनी केस) से बाहर नहीं जाना चाहिए। मध्यप्रदेश सरकार का तर्क है कि राज्य में पिछड़ा वर्ग की आबादी को देखते हुए यह आरक्षण संवैधानिक रूप से जायज है।
अब तक की देरी का कारण
अब तक मध्यप्रदेश सरकार की ओर से कई बार विस्तृत बहस के लिए समय मांगा गया है। वर्तमान में मध्यप्रदेश में कई भर्तियां और परीक्षाओं के परिणाम ’87-13′ के फार्मूले (87% मुख्य परिणाम और 13% प्रावधिक) के आधार पर घोषित किए जा रहे हैं, जिससे छात्रों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
क्या है अनुच्छेद 226 और राज्य की भूमिका?
संविधान का अनुच्छेद 226 हाईकोर्ट को रिट जारी करने और मौलिक अधिकारों के साथ-साथ कानूनी संवैधानिकता की जांच करने की शक्ति देता है। सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि क्या राज्य सरकार का यह संशोधन कानूनी रूप से स्थिर रह पाएगा या नहीं।
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