नई दिल्ली। जर्नल एनवायरमेंटल साइंस (Journal Environmental Science) एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित इस नए अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में जंगलों, घास (forests, grass) के मैदानों और पीटलैंड में लगने वाली आग पहले के अनुमानों से कहीं ज्यादा मात्रा में हानिकारक गैसें और कार्बनिक यौगिक वातावरण में छोड़ रही है।
शोधकर्ताओं ने 1997 से 2023 के बीच जली वनस्पतियों के वैश्विक आंकड़ों का विश्लेषण किया और पाया कि आग से निकलने वाला प्रदूषण वायु गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। जंगलों की आग से निकलने वाले धुएं में सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड ही नहीं, बल्कि कई ऐसे कार्बनिक यौगिक भी होते हैं जो ज्यादा खतरनाक साबित हो रहे हैं। इनमें इंटरमीडिएट और सेमी-वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स शामिल हैं, जो गर्मी में उड़कर गैस बनते हैं और हवा में जाकर बेहद महीन कणों का रूप ले लेते हैं।
2001 के बाद 60% बढ़ा सीओ2 उत्सर्जन
जर्नल साइंस में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के मुताबिक, 2001 के बाद से जंगलों की आग से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) उत्सर्जन में करीब 60 फीसदी की वृद्धि हुई है। जलवायु के प्रति अत्यधिक संवेदनशील उत्तरी बोरियल वनों में यह उत्सर्जन लगभग तीन गुना तक बढ़ गया है। रिसर्च से यह भी पता चला है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के बाहर मौजूद जंगलों में भी सीओ2 उत्सर्जन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। इन क्षेत्रों से हर साल करीब 50 करोड़ टन अतिरिक्त सीओ2 वातावरण में जा रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि उत्सर्जन का केंद्र धीरे-धीरे उष्णकटिबंधीय जंगलों से बाहर के क्षेत्रों की ओर खिसक रहा है। तस्मानिया विश्वविद्यालय के एक अध्ययन ने आग के बढ़ते मौसम की ओर भी ध्यान दिलाया है।
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