वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald trump) की धमकियों ने वैश्विक राजनीति के खेल को बदल दिया है। अमेरिका की टैरिफ (US tariffs) धमकियों के बीच अब यूरोप समेत तमाम नाटो देश अब आर्थिक पुनर्संतुलन की तरफ देख रहे हैं। यूरोपीय संघ इस समय भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता करके खुशियां मना रहा है, तो वहीं कनाडा और ब्राजील के प्रधानमंत्री भी जल्दी ही भारत यात्रा की योजना बना रहे हैं। दूसरी तरफ अमेरिका का सबसे बड़ा साझेदार ब्रिटेन भी अब दूसरी तरफ यानी चीन के साथ अपने संबंधों में सुधार की तरफ देख रहा है, इसके लिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जल्द ही चीन यात्रा पर जाने वाले हैं।
वैश्विक राजनीति के जानकारों की मानें तो कभी अमेरिका के सहयोगी रहे इन देशों का दूसरे मुल्कों की तरफ देखने का सबसे बड़ा कारण ट्रंप की टैरिफ धमकियां और अमेरिका से अपनी निर्भरता को कम करना है। पहले से ही इस मुद्दे पर इन देशों की राय ऐसा बनने लगी थी, लेकिन ट्रंप की टैरिफ नीति ने इस प्रक्रिया को और भी ज्यादा तेज कर दिया है।
ब्रिटेन ने किया चीन का रुख
एक समय पर अमेरिका के साथ मिलकर चीन को खरी-खोटी सुनाने वाला ब्रिटेन अब चीन के साथ मिलकर नए व्यापारिक समझौते करने की राह पर है। चीन और ब्रिटेन के संबंधों की उदासीनता को इस तरह से समझा जा सकता है कि तीन दिवसीय दौरे पर चीन जा रहे कीर स्टार्मर की यात्रा पिछले आठ सालों में किसी ब्रिटिश पीएम की पहली यात्रा होगी। स्टार्मर अपनी इस यात्रा में करीब दर्जन भर कारोबारियों और दो मंत्रियों के साथ जा रहे हैं। यहां पर वह चीनी राष्ट्रपति से मुलाकात करेंगे और दोनों देशों के साझा व्यापारिक हितों पर बात करेंगे।
रॉयटर्स के अनुसार, इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन की उस आर्थिक निर्भरता को कम करना है, जो एक “तेजी से अप्रत्याशित” होते जा रहे अमेरिका पर है। 2024 में सत्ता में आने के बाद से ब्रिटिश पीएम दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के साथ संबंधों को नए सिरे से स्थापित करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। ब्रिटेन पहले ही भारत के साथ व्यापार समझौता कर चुका है।
लंदन के किंग्स कॉलेज में चीन स्टडीज के प्रोफेसर केरी ब्राउन ने रॉयटर्स से कहा, “एआई, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे अहम वैश्विक मुद्दों पर लंदन शायद वॉशिंगटन की तुलना में बीजिंग के ज़्यादा करीब है।”
हालांकि चीन को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ बनी हुई हैं, फिर भी ब्रिटिश सरकार नज़दीकी कारोबारी रिश्तों को राष्ट्रीय हित का विषय मानती है।
भारत और कनाडा के सुधरते रिश्ते
कनाडाई मूल के खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद भारत और कनाडा के रिश्तों में एक खटास आ गई थी। लेकिन अब जबकि ट्रंप की टैरिफ धमकियों के बाद कनाडा को एक मजबूत साथी की जरूरत पड़ी है तो वह चीन और भारत की तरफ देख रहा है। कनाडा भी अपनी “व्यापार विविधीकरण” रणनीति पर काम कर रहा है ताकि ट्रंप प्रशासन के दबाव से अपनी संप्रभुता को सुरक्षित रख सके।
प्रधानमंत्री मार्क कार्नी मार्च के पहले सप्ताह में भारत आने वाले हैं। भारत के केंद्रीय बजट पेश होने के कुछ ही हफ्तों बाद। यह रुख उस तनाव पूर्ण दौर के बाद सामने आया है, जो जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल में भारत–कनाडा संबंधों में देखने को मिला था और जो अब धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है।
वैश्विक राजनीति के जानकारों के मुताबिक ओटावा की इस जल्दबाजी के पीछे सबसे बड़ी वजह ट्रंप द्वारा कनाडा पर बनाया जा रहा दबाव ही है।
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