
नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू(Union Minister Ravneet Singh Bittu) ने बताया कि PM मोदी बजट सत्र में शामिल होने के बाद रविवार दोपहर डेरा बल्लां(Dera Ballan) पहुंचेंगे। उन्होंने इसे पंजाब(Punjab) के सभी समुदायों(all communities) के लिए गौरव का क्षण(moment of pride) बताया और विपक्षी दलों से इस दौरे का राजनीतिकरण न करने की अपील की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी(Prime Minister Narendra Modi) 1 फरवरी को रविदास जयंती(Ravidas Jayanti) के अवसर(occasion) पर पंजाब के जालंधर जिले(Jalandhar in Punjab) के पास स्थित डेरा सचखंड बल्लां(Dera Sachkhand Ballan) का दौरा करने वाले हैं। प्रधानमंत्री की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब पंजाब(Punjab) में लगभग एक साल बाद विधानसभा चुनाव(assembly elections) प्रस्तावित हैं और भाजपा राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिशों में जुटी है। दूसरी तरफ, 77वें गणतंत्र दिवस(77th Republic Day) के मौके पर डेरा प्रमुख संत निरंजन दास को पद्मश्री सम्मान(Padma Shri award) देने का ऐलान हुआ है। इससे इस दौरे का राजनीतिक और सामाजिक महत्व और भी बढ़ गया है।
रविदास जयंती पर उच्चस्तरीय उपस्थिति
दरअसल, दिसंबर में डेरा प्रमुख निरंजन दास ने वरिष्ठ भाजपा नेताओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात कर 1 फरवरी को रविदास जयंती समारोह में शामिल होने और अगले वर्ष संत गुरु रविदास जी की 650वीं जयंती को देशभर में मनाने का आग्रह किया था। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने बताया कि पीएम मोदी संसद में केंद्रीय बजट सत्र में शामिल होने के बाद रविवार दोपहर डेरा बल्लां पहुंचेंगे। उन्होंने इसे पंजाब के सभी समुदायों के लिए “गौरव का क्षण” बताया और विपक्षी दलों से अपील की कि वे इस दौरे का राजनीतिकरण न करें।
डेरा बल्लां: दोआबा की राजनीति की धुरी क्यों?
पंजाब के दोआबा क्षेत्र में स्थित यह डेरा रविदासिया समुदाय का प्रमुख धार्मिक केंद्र है। पंजाब में दलित आबादी 32% है, जो देश में सबसे अधिक है। इस राज्य में 45% से अधिक दलित दोआबा क्षेत्र में ही रहते हैं। राजनीतिक रूप से देखें तो दोआबा क्षेत्र से विधानसभा की कुल 117 में से 23 सीटें आती हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार डेरा बल्लां का प्रभाव इनमें से कम से कम 19 सीटों पर माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषक रॉन्की राम के अनुसार, “डेरों की सामाजिक भूमिका के कारण दलित समुदाय में उनका गहरा प्रभाव है, और चुनावी राजनीति में इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
चुनावों में निर्णायक भूमिका
डेरा बल्लां की भूमिका 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में साफ दिखी थी, जब आम आदमी पार्टी की लहर के बावजूद कांग्रेस दोआबा में मजबूती से टिकी रही। 23 में से AAP और कांग्रेस ने 10-10 सीटें, जबकि SAD, BSP और BJP को एक-एक सीट मिली थी। उससे पांच साल पहले यानी 2017 में कांग्रेस ने दोआबा में क्लीन स्वीप किया था। इसी वजह से लगभग सभी दलों के नेता, चाहे वह अरविंद केजरीवाल रहे हों या मुख्यमंत्री भगवंत मान, या कांग्रेस सांसद चरणजीत सिंह चन्नी, पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा या अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल, सभी डेरा प्रमुख से मुलाकात करते रहे हैं।
भाजपा की रणनीति और संदेश
पंजाब भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष अश्वनी शर्मा ने कहा कि “संत निरंजन दास जी ने गुरु रविदास महाराज के विचारों को देश-विदेश तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है।” इसलिए सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान देने का फैसला किया है। उन्होंने पद्मश्री सम्मान को “हर वर्ग, समुदाय और क्षेत्र के योगदान को सम्मान देने की केंद्र सरकार की सोच” का प्रतीक बताया।
2009 से बदली दिशा
डेरा सचखंड बल्लां 2009 में तब सुर्खियों में आया जब ऑस्ट्रिया के वियना में संत रामानंद की हत्या कर दी गई। इस घटना ने पंजाब में दलित-सिख तनाव को जन्म दिया। उस हमले में वर्तमान डेरा प्रमुख निरंजन दास भी घायल हुए थे। इसके बाद 2010 में निरंजन दास ने वाराणसी स्थित गुरु रविदास जन्मस्थली से रविदासिया धर्म की घोषणा की और ‘अमृत बाणी: सतगुरु रविदास ग्रंथ’ को पवित्र ग्रंथ के रूप में अपनाया। यह कदम समुदाय के लिए मील का पत्थर माना गया, हालांकि इससे डेरा के भीतर मतभेद भी उभरे। पूर्व डेरा नेता सुरिंदर दास ने पास के कठार गांव में अलग डेरा स्थापित कर गुरु ग्रंथ साहिब को मान्यता दी।
धर्म, समाज और राजनीति का संगम
विशेषज्ञों का मानना है कि डेरा सचखंड बल्लां केवल एक धार्मिक संस्था नहीं, बल्कि दलित सामाजिक सशक्तिकरण, पहचान और राजनीतिक प्रभाव का केंद्र बन चुका है। प्रधानमंत्री की प्रस्तावित यात्रा इस बात का संकेत है कि पंजाब की राजनीति में डेरा बल्लां की भूमिका आने वाले समय में और भी निर्णायक होने वाली है।
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