
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल(West Bengal) में विधानसभा चुनाव(assembly elections) से ठीक पहले राष्ट्रपति शासन की अटकलों ने राजनीतिक (Speculation about President’s rule)हलकों में सनसनी(political circles) मचा दी है। राज्यपाल का अचानक बदलाव(surrounding), राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Draupadi Murmu’s)के दौरे पर विवाद और चुनाव आयोग की टीम के दौरे(protests during the visit of the Election Commission team) के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन ने इस स्थिति को और गंभीर(aggravated the situation) बना दिया है।
इतिहास की झलक
पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू होने का इतिहास बहुत लंबा नहीं है। इससे पहले 30 अप्रैल 1977 को तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जो वाममोर्चा सरकार के शपथ ग्रहण तक 52 दिनों तक चला। अब 49 साल बाद विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या बंगाल एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है।
चुनाव आयोग का दौरा और विरोध
चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ ने कोलकाता दौरे के दौरान सभी राजनीतिक दलों और पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की। हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कांफ्रेंस में इस मुद्दे पर सीधे जवाब देने से परहेज किया और कहा कि कानून-व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा के बाद चुनाव की तारीख और चरण तय किए जाएंगे।
तृणमूल कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने एक या दो चरणों में मतदान कराने की मांग की। लेकिन आयोग को कोलकाता और आसपास बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। तृणमूल समर्थकों ने काले झंडे दिखाए और “लोकतंत्र का हत्यारा” जैसे पोस्टर भी लगाए।
एसआईआर की प्रक्रिया और विवाद
राज्य में नवंबर से चल रही एसआईआर (Special Summary Revision) प्रक्रिया के तहत लगभग 60 लाख मतदाताओं के दस्तावेज विचाराधीन हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दस्तावेजों की जांच में न्यायिक अधिकारियों को दो महीने का समय लगने की संभावना है। राजनीतिक दलों का कहना है कि इस स्थिति में चुनाव कराना चुनौतीपूर्ण होगा।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत से वैध वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाने की साजिश की जा रही है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अचानक राज्यपाल सीवी आनंद बोस की जगह आर.एन. रवि को क्यों नियुक्त किया गया, जो तमिलनाडु में विवादित रह चुके हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का दौरा और विवाद
राष्ट्रपति का दौरा सिलीगुड़ी में आदिवासी सम्मेलन के लिए था, लेकिन मुख्यमंत्री ने इसे लेकर असंतोष जताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए तृणमूल कांग्रेस पर राष्ट्रपति के अपमान का आरोप लगाया।
राजनीतिक माहौल और भविष्य की चुनौतियां
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एसआईआर के तहत विचाराधीन 60 लाख मतदाताओं के दस्तावेज समय पर जांच कर लिए जाएंगे। यदि यह कार्य पूरा नहीं हुआ, तो या तो चुनाव टाला जा सकता है या बिना पूरी सूची के चुनाव कराना पड़ सकता है, जिससे राष्ट्रपति शासन की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।अगले कुछ दिनों में केंद्र और चुनाव आयोग की रिपोर्ट के आधार पर यह साफ होगा कि पश्चिम बंगाल की राजनीतिक दिशा कैसी होगी।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved