
नई दिल्ली । पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (Former President Ram Nath Kovind) ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने जनता के साथ भरोसे का रिश्ता बनाए रखा (Has maintained bond of trust with the People) ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू को पीछे छोड़कर लगातार सबसे लंबे कार्यकाल पूरा करने की उपलब्धि अपने नाम की है। इस पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की कामयाबी इसी बात में है कि वे लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं और जनता के साथ भरोसे का रिश्ता बनाए रखा है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने एक लेख लिखा है, जिसका शीर्षक है ‘भारत की खोज से लेकर भारत पर भरोसे तक’। इसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी के भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले चुने हुए प्रधानमंत्री बनने पर अपना एक नजरिया पेश किया।
रामनाथ कोविंद ने लिखा, “10 जून 2026 का दिन आजादी के बाद भारत के इतिहास में एक खास मौका है। इस तारीख को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ते हुए भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार सेवा करने वाले लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री का दर्जा हासिल किया। हालांकि यह अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, लेकिन नेहरू से अधिक समय तक पद पर रहने की बात भारत के लिए आजादी के बाद के उस अहम दौर के सभी जरूरी पहलुओं को पूरी तरह नहीं दिखाती, जिसे एक निर्णायक मोड़ कहा जा सकता है।”
पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि 26 मई, 2014 से भारतीय राजनीति ने उस तरह की ‘भारतीयता’ की ओर एक निर्णायक कदम बढ़ाया है, जिसकी वकालत महात्मा गांधी, सरदार पटेल, बाबासाहेब बी.आर. अंबेडकर, राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी, केएम मुंशी और आधुनिक भारत के कई अन्य निर्माताओं ने की थी। इन लोगों ने अपनी विरासत और परंपराओं पर गहरे गर्व के साथ प्राचीन भारतीय संस्कृति और सभ्यता की नई कल्पना की थी। आर्थिक विकास के क्षेत्र में, प्रधानमंत्री मोदी ने सबको साथ लेकर चलने (समावेशिता) के साथ राजाजी के मॉडल को आगे बढ़ाया है।
विश्व में भारतीय लोकतंत्र की चर्चाओं को लेकर पूर्व राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी को श्रेय दिया। उन्होंने लिखा, “25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने आखिरी भाषण में अंबेडकर ने ऐतिहासिक और विद्वतापूर्ण बात कही थी कि संसदीय लोकतंत्र के तत्व 2,500 साल पुरानी बौद्ध संस्थाओं में मिलते थे और उन बौद्ध संस्थाओं ने उस समय की राजनीतिक संस्थाओं से लोकतांत्रिक तौर-तरीके अपनाए होंगे। इसके बावजूद, हमारे छात्रों और कानून के जानकारों को यह यकीन दिलाया गया कि हमारा लोकतंत्र पश्चिमी देशों की देन है। मोदी वैश्विक मंचों पर यह कहते रहे हैं कि भारत लोकतंत्र की जननी है और वे प्राचीन भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों और तौर-तरीकों का जिक्र करते हैं और दुनिया अब इस बात को समझ रही है कि भारत न सिर्फ सबसे पुराना, बल्कि सबसे बड़ा और सबसे जीवंत लोकतंत्र भी है।”
रामनाथ कोविंद ने भारत की चुनाव प्रक्रिया और मतदाताओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “भारत के लगभग 100 करोड़ मतदाताओं की संख्या दुनिया के बाकी देशों के लिए हैरान करने वाली बात है। दिलचस्प बात यह है कि मतदाताओं की यह संख्या आजादी के समय भारत की कुल आबादी से लगभग तीन गुना अधिक है। मतदाताओं की संख्या के साथ-साथ चुनावी प्रक्रिया की जटिलता भी बढ़ती जा रही है। 1951-52 के आम चुनाव में सिर्फ 53 राजनीतिक पार्टियां शामिल हुई थीं, जबकि 2024 के आम चुनाव में 744 राजनीतिक पार्टियों ने हिस्सा लिया।”
इस दौरान, कोविंद ने कहा, “नेहरू के समय की तुलना में लोगों की उम्मीदें और उनकी नजर रखने का दायरा बहुत बढ़ गया है। बढ़ती उम्मीदों पर खरा उतरना और लोगों के साथ भरोसे का मजबूत रिश्ता बनाए रखना पीएम मोदी की एक बड़ी कामयाबी है। उनकी लोकप्रियता रेटिंग लगातार ऊंची बनी हुई है, जबकि नेहरू को अपने कार्यकाल के दौरान अपनी छवि और लोकप्रियता में भारी गिरावट का सामना करना पड़ा था। 1950 और 1960 के दशक में और 1970 के दशक तक भी, दुनिया भर में कई लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेताओं का कार्यकाल लंबा रहा था। 21वीं सदी की दुनिया में राजनीतिक नेताओं का कार्यकाल बहुत छोटा रहा है। मोदी इस ग्लोबल ट्रेंड से अलग एक अपवाद हैं।”
रामनाथ कोविंद ने पिछली सरकारों पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “यह सही कहा जाता है कि कोई भी समाज तब तक मजबूत और सम्मानित नहीं बन सकता, जब तक उसमें आत्मगौरव की भावना न हो। भारत सदियों से सभ्यतागत और सांस्कृतिक उत्कृष्टता की कहानी रहा है, लेकिन औपनिवेशिक शासकों की ओर से पैदा की गई हीन भावना स्वतंत्रता के बाद भी लंबे समय तक बनी रही। अनेक औपनिवेशिक परंपराएं जारी रहीं और उनका महिमामंडन भी हुआ। एक ऐसा अभिजात्य वर्ग विकसित हुआ जिसने थॉमस बैबिंगटन मैकाले के विचारों और आदर्शों को आगे बढ़ाया। स्वतंत्रता के बाद के दशकों में अंग्रेजी को सत्ता की भाषा के रूप में बढ़ावा दिया गया।”
पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि आजादी के बाद के शुरुआती दशक और पिछले 12 साल के बीच एक बड़ा फर्क साफ दिखता है। नेहरू के दौर में पश्चिम से सांस्कृतिक और आर्थिक मंजूरी और मदद पाने की चाहत थी। वहीं, मोदी के दौर में मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था पर भरोसा है, जो दुनिया में आने वाली बड़ी-बड़ी मुश्किलों का भी सामना कर सकती है। मोदी के दौर में भारतीय भाषाओं, सांस्कृतिक प्रतीकों, मूल्यों और परंपराओं पर गर्व की भावना भी साफ दिखती है।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved