
डेस्क: मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के लिए होने वाली फंडिंग पर नजर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था FATF ने भारत के सीनियर अफसर विवेक अग्रवाल को उपाध्यक्ष चुना है. उनका कार्यकाल जुलाई 2026 से जून 2027 तक रहेगा. यह पहली बार है जब भारत FATF के उपाध्यक्ष पद पर पहुंचा है. विवेक अग्रवाल फिलहाल भारत के संस्कृति मंत्रालय में सचिव हैं. भारत सरकार ने इसे देश के लिए बड़ी उपलब्धि बताया है.
अग्रवाल ने कहा कि यह नियुक्ति मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादी फंडिंग के खिलाफ भारत के मजबूत ढांचे की पहचान है. भारत को यह पद मिलने के बाद पाकिस्तान को फिर से FATF की ग्रे लिस्ट में डालने की मांग उठने लगी है. AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि भारत को पाकिस्तान को दोबारा ग्रे लिस्ट में लाने के लिए काम करना चाहिए.
ओवैसी ने नवंबर 2025 में दिल्ली के लाल किला इलाके के पास हुए कार बम धमाके का जिक्र किया था, जिसमें 8 लोगों की मौत हुई थी. इस हमले की जिम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) नामक संगठन ने ली थी. ओवैसी ने कहा कि TRF को संयुक्त राष्ट्र की आतंकी लिस्ट में भी शामिल किया जाना चाहिए. भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि FATF में यह जिम्मेदारी मिलने से आतंकवाद और अवैध धन के खिलाफ भारत की लड़ाई और मजबूत होगी.
पाकिस्तान जून 2018 में FATF की ग्रे लिस्ट में डाला गया था. इससे पहले वह 2013 से 2016 तक भी इस सूची में रह चुका था. करीब चार साल बाद अक्टूबर 2022 में उसे ग्रे लिस्ट से बाहर कर दिया गया. भारत का आरोप है कि पाकिस्तान अब भी कुछ चरमपंथी संगठनों के खिलाफ पूरी कार्रवाई नहीं कर रहा है. पहलगाम हमले के बाद भी भारत ने कहा था कि वह पाकिस्तान को दोबारा ग्रे लिस्ट में शामिल कराने की कोशिश करेगा.
मई 2025 में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में भारतीय सूत्रों ने दावा किया था कि पाकिस्तान अभी भी FATF की कुछ शर्तें पूरी नहीं कर पाया है. हालांकि पाकिस्तान के विशेषज्ञ इस खतरे को उतना बड़ा नहीं मानते. पाकिस्तान के पूर्व निवेश मंत्री हारून शरीफ का कहना है कि FATF के फैसले राजनीतिक नहीं बल्कि सामूहिक सहमति से होते हैं. आर्थिक विश्लेषक फर्रुख सलीम ने भी कहा कि FATF का उपाध्यक्ष अकेले किसी देश को ग्रे लिस्ट में नहीं डाल सकता.
फिलहाल FATF की ग्रे लिस्ट में 18 देश हैं. वहीं ईरान, उत्तर कोरिया और म्यांमार ब्लैक लिस्ट में शामिल हैं. ग्रे लिस्ट में आने पर किसी देश को विदेशी निवेश, कर्ज और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए पाकिस्तान में भी इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है.
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