नई दिल्ली। पाकिस्तान (Pakistan) के सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। हाल के दिनों में अलगाववादी संगठनों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच हिंसक घटनाएं तेज हुई हैं। इसी बीच सोशल मीडिया पर ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ (Republic of Balochistan) के नाम से एक कथित घोषणा वायरल हुई, जिसमें समानांतर सरकार और स्वतंत्र राष्ट्र होने का दावा किया गया। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
इन घटनाओं के बीच 1947-48 में बलूचिस्तान, विशेषकर तत्कालीन कलात रियासत, के राजनीतिक भविष्य और पाकिस्तान में उसके विलय का इतिहास फिर चर्चा में आ गया है।
ब्रिटिश शासन के अंतिम दौर में बलूचिस्तान दो हिस्सों में बंटा हुआ था। एक हिस्सा ब्रिटिश बलूचिस्तान था, जो सीधे अंग्रेजी प्रशासन के अधीन था, जबकि दूसरा हिस्सा कई रियासतों का समूह था। इनमें सबसे प्रभावशाली रियासत कलात थी, जिसके शासक खान मीर अहमद यार खान थे।
ब्रिटिश शासन समाप्त होने के बाद रियासतों के सामने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने अथवा अन्य राजनीतिक व्यवस्था तलाशने के विकल्प मौजूद थे।
बलूच राष्ट्रवादी समूहों के अनुसार, 11 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सरकार, पाकिस्तान के नेताओं और कलात के शासक के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें कलात की विशेष स्थिति को स्वीकार किया गया। इसके बाद 15 अगस्त 1947 को कलात ने स्वयं को स्वतंत्र और संप्रभु राज्य घोषित कर दिया।
बताया जाता है कि खान मीर अहमद यार खान ने दो सदनों वाली एक संसद भी बनाई थी, जिसमें दार-उल-अमरा और दार-उल-अवाम शामिल थे।
पाकिस्तान बनने के बाद कलात और पाकिस्तान के बीच भविष्य को लेकर बातचीत शुरू हुई।
बलूच राष्ट्रवादी दावा करते हैं कि कलात की संसद ने पाकिस्तान में विलय के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था और अपनी अलग ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा भाषाई पहचान का हवाला दिया था।
वहीं पाकिस्तान का आधिकारिक रुख रहा है कि कलात एक रियासत थी और उसके शासक को विलय का कानूनी अधिकार प्राप्त था। पाकिस्तान के अनुसार, 1948 में हुआ विलय वैध और विधिसम्मत था।
कुछ इतिहासकारों और बलूच राष्ट्रवादी स्रोतों के अनुसार, 1948 की शुरुआत में पाकिस्तान के बढ़ते दबाव के बीच कलात के शासक ने भारत से संपर्क करने की कोशिश की थी। दावा किया जाता है कि भारत के साथ विलय या रक्षा सहयोग का प्रस्ताव भी रखा गया था।
इन दावों के अनुसार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। इतिहासकार इसके पीछे कई कारण बताते हैं, जिनमें भारत और कलात के बीच सीधी सीमा का अभाव, विभाजन के बाद की आंतरिक चुनौतियां और पाकिस्तान के साथ नए सैन्य विवाद से बचने की नीति शामिल थी। हालांकि, इस दावे पर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत हैं और इसे लेकर सर्वसम्मति नहीं है।
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, मार्च 1948 में पाकिस्तान ने कलात के आसपास की रियासतों मकरान, लासबेला और खैरान के साथ अलग-अलग विलय समझौते किए। बलूच राष्ट्रवादी इसे कलात को राजनीतिक और भौगोलिक रूप से अलग-थलग करने की रणनीति बताते हैं।
इसके बाद पाकिस्तानी सेना कलात क्षेत्र में पहुंची और 27 मार्च 1948 को खान मीर अहमद यार खान ने पाकिस्तान के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।
पाकिस्तान इस प्रक्रिया को वैध विलय मानता है, जबकि कई बलूच राष्ट्रवादी संगठन इसे दबाव में कराया गया निर्णय बताते हैं और आज भी इसका विरोध करते हैं।
विलय के कुछ समय बाद ही खान के छोटे भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने पाकिस्तान के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया। इसे बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन की शुरुआती घटनाओं में गिना जाता है।
बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। यहां प्राकृतिक गैस, तांबा, सोना और अन्य खनिज संसाधनों के बड़े भंडार मौजूद हैं।
बलूच राष्ट्रवादी संगठनों का आरोप है कि प्रांत के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ स्थानीय लोगों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंचता और उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा आर्थिक विकास में भी अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिलती। दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार इन आरोपों से इनकार करते हुए कहती है कि वह बलूचिस्तान के विकास और सुरक्षा के लिए लगातार निवेश कर रही है।
आज भी बलूचिस्तान का इतिहास, उसका विलय और वहां चल रहा अलगाववादी आंदोलन दक्षिण एशिया की सबसे जटिल राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों में से एक माना जाता है।
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