
यही तो गड़बड़ है नरोत्तमजी… नेता को दोस्ती रखना नहीं चाहिए और दुश्मनी करना नहीं चाहिए… मंच से धमकी… सरकार आपकी है… ताकत आपकी है… जिसे चाहो संवार दो… जिसे चाहो उजाड़ दो… टिकट खोने के बाद भी नरोत्तमजी के न तेवर बदले, न मिजाज सुधरे… रस्सी जल गई, पर बल नहीं गया… जिस अधिकारी को सरकार ने कानून व्यवस्था का जिम्मा सौंपा, आप उस एसपी को मंच से दोस्ती-दुश्मनी समझा रहे हैं… खुलेआम धमका रहे हैं… जनता को बौना और खुद को महान बता रहे हैं… आपकी समस्या यही तो है कि आप दोस्ती और दुश्मनी नहीं भूलते… दोस्तों को माथे पर बिठाते हैं… आपके दोस्त हर किसी को निपटाते हैं.. आपकी ताकत पर हिमाकत दिखाते हैं और सभ्यता को नोंच डालते हैं… इन दोस्तों की हरकतों और हिमाकतों पर कोई यदि एतराज जताए… रोकने की हिम्मत दिखाए तो आप उसे दुश्मन बना डालते हैं… आपके दोस्तों के हाथों लुटे-पिटे लोगों को आप नोंच डालते हैं, क्योंकि आप तो दोस्ती के लिए दुश्मनी को गले लगा लेते हैं… यह तक भूल जाते हैं कि आप चुनावी मंच पर हैं… जनता के वोट मांगने के लिए सर झुकाने के बजाय आंखें दिखाने और जुबान गुर्राने के नुकसान समझते होंगे, इसीलिए एक तीर से दो निशाने लगाते नरोत्तमजी अपने तेवर की ताकत दिखाने और टिकट काटने वाली भाजपा को ठिकाने लगाने के लिए जनता को भडक़ाने और वोट कटवाकर अपने प्रत्याशी को हराने की जुगत भिड़ाने की कोशिश करते नजर आए … हालांकि उनके भी चुनाव हारने का कारण उनकी यही दोस्ती और दुश्मनी रही है… गृहमंत्री के पद पर रहते उनके समर्थक खुद को कानून का मसीहा मानने लगते थे… दतिया को चम्बल बनाते इन समर्थकों ने ऐसी लूटपाट मचाई कि मंत्रीजी के सारे वोट जनता ने लूट लिए और मंत्रीजी का मंत्रालय तो दूर खुद उनका गृह तक पराया कर दिया… दरअसल जनता ने दतिया में कांग्रेस को नहीं जिताया, बल्कि मिश्राजी की दोस्ती और दुश्मनी को हराया था… इसी माहौल को ताड़ती भाजपा ने उनका टिकट काटते हुए दरिया किनारे बना उनका घर और लौटकर आने की धमकी दोनों को किनारे कर टिकट छीन लिया…वैसे भी किसी राजनेता की दोस्ती केवल जनता से होना चाहिए और दुश्मनी केवल उनके साथ हो रहे जुल्म से रहना चाहिए… लेकिन वो दुश्मनी जनता से करते हैं और दोस्ती उन पर जुल्म करने वाले दोस्तों से… इसीलिए ऐसे नेता नरोत्तम बन जाते हैं और आंसू बहाते हैं… सभ्यता का सिद्धांत है कि बलशाली लोगों को व्यक्ति से नहीं भ्रष्टाचार से लडऩा चाहिए और दोस्ती सभ्यता से रखना चाहिए… वरना गुंडाई दोस्त करते हैं… शरीफों को नोंचते हैं और दोष नेता पर लगते हैं… नरोत्तमजी अभी भी यही कर रहे हैं… टिकट काटने वाली भाजपा से दुश्मनी भुला नहीं पा रहे हैं… और उनके उम्मीदवार को मंच से ही ठिकाने लगा रहे हैं..
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