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सुप्रीम कोर्ट का फैसला, अवैध लिंग जांच में पुलिस नहीं दर्ज कर सकती FIR; छापे का भी अधिकार नहीं

August 20, 2026

नई दिल्ली। पीसीपीएनडीटी कानून के तहत दर्ज अपराधों की जांच पुलिस नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यह अहम फैसला सुनाया। अदालत ने साफ-साफ कहा कि ऐसे मामलों में कार्रवाई कानून के तहत नामित अधिकारियों को ही करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून से जुड़े मामले तकनीकी होते हैं। इनमें चिकित्सकीय जानकारी और संवेदनशीलता की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में पुलिस को इस कानून के तहत जांचकर्ता की भूमिका नहीं दी जा सकती।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम कानून के तहत मामलों की जांच के लिए विशेष समझ की जरूरत होती है। पीठ ने कहा, ‘इस कानून के उद्देश्यों के लिए पुलिस जांचकर्ता नहीं है।’ हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के प्रावधानों के अनुसार पुलिस सहायक भूमिका निभा सकती है। पीसीपीएनडीटी कानून गर्भ में पल रहे भ्रूण का लिंग पता लगाने के लिए जन्म से पहले की निदान तकनीकों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के उद्देश्य से बनाया गया था।


  • सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी स्थिति साफ कर दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस की जांच पर रोक केवल पीसीपीएनडीटी कानून के तहत आने वाले अपराधों तक सीमित है। अगर किसी मामले में सामान्य आपराधिक कानून के तहत कोई अलग अपराध सामने आता है, तो पुलिस उसकी जांच कर सकती है और अभियोजन भी चला सकती है। यानी शीर्ष अदालत के फैसले से पुलिस की दूसरी कानूनी शक्तियों पर कोई रोक नहीं लगाई गई है।

    शीर्ष अदालत का यह फैसला उस मामले में आया, जिसमें यह सवाल उठाया गया था कि क्या पुलिस प्राथमिकी दर्ज कर सकती है और गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 के तहत अपराधों की जांच कर सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे मामलों में कानून के तहत तय नामित अधिकारियों को कार्रवाई करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, ऐसे मामलों में पुलिस के पास न तो एफआईआर दर्ज करने का अधिकार है न ही अस्पताल पर छापेमारी करने का।

    पीसीपीएनडीटी यानी गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 का मकसद भ्रूण का लिंग पता लगाने और लिंग चयन पर रोक लगाना है। इस कानून के तहत नियमों का उल्लंघन करने पर पहली बार दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की कैद और 10 हजार से लेकर 50 हजार रुपये तक जुर्माना हो सकता है। दोबारा अपराध करने पर पांच साल तक की कैद और 50 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।

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