
पहले डिजिटल का राग गाया… फिर जब नकदी का संकट आया… अधिकारियों से लेकर नेताओं तक के लिए रिश्वत का जुगाड़ संकट में आया, तो डिजिटल पर ब्रेक लगाने के लिए यूपीआई पर टैक्स लगाया… बस यही दो लाइन की कहानी है जनता को पहले लत लगवाने की, फिर लत छुड़वाने के लिए तरीके आजमाने की… जब मोदी सत्ता में आए तो बैंकों का खजाना खाली पड़ा था… बड़े-बड़े उद्योगपति लाखों-करोड़ का कर्ज डकार चुके थे… हालात ऐसे थे कि कभी भी बैंकें दिवालिया हो जातीं और सरकार की साख लुट जाती… व्यापार-कारोबार चौपट हो जाते… देश दलदल में धंस जाता और आर्थिक आपातकाल लग जाता… इसी संकट से निपटने के लिए सरकार ने पहले डिजिटल पेमेंट का राग अलापा, ताकि बैंकों की नकदी बाहर नहीं जाए… मोदी सरकार आने के दो साल बाद ही 11 अप्रैल 2016 को डिजिटल पेमेंट यानी यूपीआई की शुरुआत की गई… इसके बाद 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी लागू कर डाली… और नतीजे में बैंकें नोटों से लबालब भर गईं… नोटबंदी का कारण नकली नोटों और आतंक पर नियंत्रण बताया गया, लेकिन नकली नोट भी खजाने में जमा हो गए और जितने छपे नहीं थे उससे ज्यादा बैंकों को मिल गए… दावे और वादे दोनों धरे रह गए… अब संकट दूसरा आ गया… जमा नोट कहां खपाएं… बैंकें लोगों को ब्याज कैसे चुकाएं… लिहाजा ब्याज दर घटाई… लोगों को लोन लेने के लिए उकसाया… व्यापार-धंधे, कारोबार के लिए कर्ज को आसान बनाया… लेकिन लोगों को पूंजी के निवेश से ज्यादा फायदा बैंकों में जमा धन के ब्याज में नजर आया… इसलिए लोगों ने कर्ज लेकर कारोबार करने में कोई रुचि नहीं दिखाई… इधर बैंकों में जमा धन घाटे का कारण बन रहा था, उधर डिजिटल पेमेंट की बढ़ती आदत से देश में नकदी का संकट बन गया… सरकार ने डिजिटल पेमेंट को लेकर इतना हल्ला मचाया कि आज भारत में कुल भुगतान के लेन-देन में डिजिटल पेमेंट की हिस्सेदारी 97.7 प्रतिशत हो गई… इसमें यूपीआई की भूमिका 84 प्रतिशत है… जिस देश की इकोनॉमी केवल नकदी में चलती थी, उस देश में आज पूरी दुनिया में होने वाले डिजिटल ट्रांजेक्शन का आधा हिस्सा अकेले भारत में होने लगा… इस संकट के चलते अधिकारियों की रिश्वत और नेताओं का चंदा दोनों का धंधा संकट में आ गया… इसलिए सरकार ने डिजिटल पेेमेंट की रफ्तार थामने के लिए और यूपीआई पर ब्रेक लगाने के लिए भुगतान पर टैक्स लगा डाला… अब लोग फिर नकदी के कारोबार में शामिल होंगे… नेताओं को चंदा, अधिकारियों को रिश्वत और कारोबारियों को काला धन मिलने लगेगा… अब देखना यह है कि पटरी पर रफ्तार पकड़ चुका देश फिर पुराने ढर्रे पर कैसे लौटेगा… बैंकों का धन घटेगा तो कितना कारोबार में लगेगा…
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