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क्या है DRDO का IRSA 2.0 मिशन? तीनों सेनाओं के रेडियो होंगे इंटरऑपरेबल

September 28, 2026

नई दिल्ली: भारतीय सेना के कम्युनिकेशन सिस्टम को लेकर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है. DRDO जल्द ही IRSA 2.0 यानी Indian Radio Software Architecture का नया वर्जन पेश करने की तैयारी में है. इसका मकसद सेना, नौसेना और वायुसेना के अलग-अलग रेडियो सिस्टम के बीच बेहतर तालमेल और इंटरऑपरेबिलिटी सुनिश्चित करना है.

IRSA 2.0 को DRDO की Defence Electronics Applications Laboratory यानी DEAL ने तीनों सेनाओं की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया है. यह पिछले साल अक्टूबर में जारी किए गए IRSA 1.0 का अगला वर्जन है.

IRSA एक तरह का कॉमन सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर स्टैंडर्ड है, जिसे सैन्य Software Defined Radios यानी SDR के लिए तैयार किया गया है.इसका फायदा यह होगा कि अलग-अलग कंपनियों या अलग-अलग प्लेटफॉर्म के रेडियो भी एक तय स्टैंडर्ड के तहत एक-दूसरे के साथ कम्युनिकेशन कर सकेंगे. IRSA में रेडियो के सॉफ्टवेयर, इंटरफेस, API और अलग-अलग वेवफॉर्म को इस्तेमाल करने के लिए कॉमन व्यवस्था तय की जाती है. इससे जरूरत के मुताबिक रेडियो को नए सॉफ्टवेयर और वेवफॉर्म के जरिए अपग्रेड करना आसान होगा.


  • DRDO के इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन सिस्टम्स के महानिदेशक डॉ. बीके दास के मुताबिक, भारतीय वायुसेना के लिए नया Software Defined Radio विकसित किया जा रहा है और 2026 के अंत तक इसका वेवफॉर्म तैयार होने की उम्मीद है.वायुसेना फिलहाल कुछ विदेशी SDR सिस्टम का इस्तेमाल करती है, जिनमें रूसी मूल के Su-30MKI जैसे फाइटर जेट पर लगे सिस्टम भी शामिल हैं. DRDO का जोर इस बात पर है कि सेना चाहे किसी भी कंपनी या देश का रेडियो इस्तेमाल करे, वह IRSA स्टैंडर्ड के अनुरूप और तीनों सेनाओं के साथ इंटरऑपरेबल होना चाहिए.

    DRDO ने नौसेना के लिए पहले ही Tactical SDR विकसित किया है, जिसका इस्तेमाल किया जा रहा है.वहीं, सेना के लिए भी SDR सिस्टम का विकास और टेस्टिंग पूरी हो चुकी है. इसका Manpack Variant, जिसे BEL ने पायलट किया है, फील्ड ट्रायल पूरा कर चुका है. अब यह प्रोग्राम इंडक्शन के अंतिम चरण में है.

    अभी अलग-अलग सेनाओं में इस्तेमाल होने वाले विदेशी रेडियो सिस्टम हमेशा आपस में आसानी से कम्युनिकेट नहीं कर पाते. संयुक्त ऑपरेशन के दौरान इससे कम्युनिकेशन गैप की चुनौती पैदा हो सकती है.स्वदेशी IRSA आर्किटेक्चर से भारत अपने वेवफॉर्म, एन्क्रिप्शन और सर्टिफिकेशन स्टैंडर्ड खुद तय कर सकेगा. इससे विदेशी वेंडर पर निर्भरता और vendor lock-in का जोखिम भी कम होगा. युद्ध या प्रतिबंधों की स्थिति में स्पेयर, अपग्रेड और तकनीकी सपोर्ट की विदेशी निर्भरता भी कम की जा सकेगी.

    कॉमन कम्युनिकेशन नेटवर्क की तैयारी
    DRDO का बड़ा लक्ष्य है कि सेना की हर यूनिट और हर स्तर को एक कॉमन कम्युनिकेशन आर्किटेक्चर से जोड़ा जा सके, चाहे उसके पास किसी भी कंपनी का रेडियो क्यों न हो. यानी IRSA 2.0 सिर्फ एक नया रेडियो सिस्टम नहीं है, बल्कि भारत की तीनों सेनाओं के लिए एक कॉमन और स्वदेशी कम्युनिकेशन इकोसिस्टम तैयार करने की दिशा में अहम कदम है.

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