
- स्वच्छता रैंकिंग से पहले कचरे से निपटने की चुनौती
उज्जैन। आने वालों दिनों में स्वच्छता रैंकिंग आने होने वाली है। इससे पहले पहले कचरे से निपटने की चुनौती बड़ी है। नगर निगम के ताजा आंकड़ों के अनुसार रोजाना औसत 180 टन निकलता है। इसमें 110 टन गीला कचरा और 70 टन सूखा कचरा होता है। पर्व के दिनों में 240-250 टन तक पहुँच जाता है।
उज्जैन के साथ इंदौर, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, सागर और सतना जैसे बड़े शहरों में भी कचरे के ढेर और पुराना लीगेसी वेस्ट चुनौती बने हुए हैं। डंपिंग साइटों पर जमा पुराना कचरा शहरों की स्वच्छता व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है। स्वच्छ सर्वेक्षण की टीमों ने फरवरी-मार्च में नगरीय निकायों का सर्वे किया था। इस बार पर्यटक, हेरिटेज और धार्मिक स्थलों के अलावा ऐसे स्थानों की स्वच्छता भी जाँची गई, जहाँ बड़ी संख्या में लोग पहुँचते हैं। स्कूलों में बच्चों के व्यवहार में स्वच्छता को लेकर बदलाव आया या नहीं, इसका भी जायजा लिया गया। नई टूलकिट में खुले में शौच और यूरिनेशन रोकने से जुड़ा इंडिकेटर भी शामिल किया गया। टीमों ने सार्वजनिक स्थानों पर इसके लिए उपलब्ध व्यवस्थाओं को भी देखा। शहर स्वच्छता की रैंकिंग में ऊंची छलांग लगाने की तैयारी में हैं, लेकिन कचरे के पहाड़ उनकी राह में सबसे बड़ी बाधा बन सकते हैं। डंपिंग साइटों पर लीगेसी वेस्ट अब भी जमा है। दूसरी ओर, एक साल में रोजाना निकलने वाले घरेलू कचरे की मात्रा में बढ़ोतरी हुई है। कचरे की बढ़ती मात्रा के मुकाबले प्रोसेसिंग क्षमता नहीं बढ़ पाने से शहरों के सामने स्वच्छता रैंकिंग बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। स्वच्छ सर्वेक्षण 2025-26 के परिणाम अक्टूबर में घोषित होने हैं। प्रदेश के करीब 15 शहर रैंकिंग की दौड़ में हैं। इनमें उज्जैन, भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, सागर और सतना जैसे बड़े शहर शामिल हैं। सर्वेक्षण में कचरा प्रबंधन के साथ मैदानी स्थिति और नागरिकों का फीडबैक भी महत्वपूर्ण होगा। प्रतिदिन निकलने वाले घरेलू कचरे की मात्रा बढ़ गई। इसके साथ ही कचरे की प्रोसेसिंग में भी अंतर बढ़ा है। प्रतिदिन कचरा प्रोसेस नहीं हो पा रहा था, अब यह गैप बढ गया है। यानी कचरा सिर्फ पैदा नहीं हो रहा, बल्कि उसके निस्तारण और प्रोसेसिंग की चुनौती भी बढ़ रही है।