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मां दुर्गा की बिंदी के नीचे मकड़ी और जाल का क्या है रहस्य, महामाया से जुड़ी इस परंपरा का जानें अर्थ

October 19, 2026

नई दिल्ली । शारदीय नवरात्र (Sharadiya Navratri) के समापन के साथ मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन (Idol Immersion) की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान श्रद्धालु पूरे विधि-विधान और भावनात्मक श्रद्धा (Devotion) के साथ देवी को विदाई देते हैं और अगले वर्ष फिर आगमन की प्रार्थना करते हैं। वर्ष 2026 में मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन 20 अक्टूबर को किया जाएगा। देवी की पूजा (Worship) से जुड़ी कई पारंपरिक मान्यताएं ऐसी हैं, जिनके प्रतीकों के पीछे धार्मिक और आध्यात्मिक अर्थ छिपे (Hidden) हुए हैं। इन्हीं में से एक है मां दुर्गा (Maa Durga) की कुछ प्रतिमाओं में माथे पर बिंदी के ठीक नीचे दिखाई देने वाली मकड़ी (Spider) और उसका जाल।

देवी की प्रतिमा में दिखाई देने वाला यह विशेष स्वरूप डाकर साज से जुड़ी सजावट में देखने को मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मकड़ी और उसका जाल महामाया का प्रतीक माने जाते हैं। महामाया उस दिव्य शक्ति को कहा जाता है, जिसके माध्यम से संसार का संचालन होता है। इस प्रतीक के जरिए जीवन, संसार और मनुष्य के मोह-माया में उलझने की स्थिति को समझाने का प्रयास किया जाता है।

धार्मिक मान्यताओं की व्याख्या करने वाले जानकारों के अनुसार, मकड़ी अपने शरीर से जाल बनाती है और उसी के बीच अपना जीवन बिताती है। इसी उदाहरण के माध्यम से मनुष्य के जीवन की तुलना संसार से की जाती है। इंसान भी अपने जीवन में परिवार, धन, रिश्तों, इच्छाओं और जिम्मेदारियों के बीच एक व्यवस्था बनाता है। समय बीतने के साथ वह इन्हीं चीजों में अधिक उलझ सकता है और कई बार इनके मोह से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।

मकड़ी के जाल को इसी सांसारिक उलझन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता के अनुसार, जिस तरह मकड़ी अपने जाल का निर्माण करती है, उसी तरह महामाया की शक्ति से संसार की व्यवस्था संचालित होती है। देवी की प्रतिमा में मकड़ी और जाल का अंकन इसी आध्यात्मिक विचार को दर्शाता है। यह प्रतीक भक्तों को जीवन की वास्तविकताओं और मोह-माया के प्रभाव पर विचार करने का अवसर देता है।

इस परंपरा में मकड़ी का एक दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण माना जाता है। मकड़ी अपना जाल बनाती है, लेकिन सामान्य रूप से उसमें फंसती नहीं है। इसी उदाहरण के जरिए मनुष्य को संदेश दिया जाता है कि वह जीवन की जिम्मेदारियां निभाते हुए भी मोह-माया में पूरी तरह न उलझे। धन, परिवार, रिश्ते और सामाजिक दायित्व जीवन के आवश्यक हिस्से हैं, लेकिन इनके प्रति अत्यधिक आसक्ति व्यक्ति को मानसिक रूप से बांध सकती है। इसलिए इस प्रतीक को संतुलित जीवन और सांसारिक बंधनों के प्रति सजग रहने की सीख के रूप में भी देखा जाता है।

मां दुर्गा की प्रतिमाओं में इस तरह के प्रतीकों का महत्व क्षेत्रीय परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग रूप में समझा जाता है। बिंदी के नीचे मकड़ी और उसके जाल का चित्रण भी इसी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। इसका अर्थ केवल प्रतिमा की सजावट तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे देवी की शक्ति और संसार की माया से जोड़कर देखा जाता है।


  • विसर्जन की बात करें तो पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से शुरू होकर 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। दिए गए मुहूर्त के अनुसार, 20 अक्टूबर को दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से 3 बजकर 30 मिनट तक प्रतिमा विसर्जन किया जा सकता है। इस दौरान श्रद्धालु मां दुर्गा को विदाई देकर सुख-समृद्धि और अगले वर्ष पुनः आगमन की कामना करेंगे।

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