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भारत-अमेरिका ट्रेड डील से लेकर रूसी तेल तक, मोदी-ट्रंप की दोस्ती पर भी बोले रुबियो-गोर

October 23, 2026

मुंबई। भारत और अमेरिका (India and America) के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते (Trade Agreements), रूस से तेल (Russia Oil) की खरीद, भारतीय पेशेवरों के वीजा, रक्षा साझेदारी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump) के रिश्तों को लेकर अमेरिका ने अपना रुख स्पष्ट किया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने आजतक को दिए विशेष साक्षात्कार में इन मुद्दों पर विस्तार से बात की। रुबियो दो दिवसीय भारत दौरे पर आए थे। इस दौरान उन्होंने मुंबई और गुजरात का दौरा किया।

यह यात्रा ऐसे समय हुई, जब वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता है, अमेरिका में डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं और अगले महीने होने वाले मध्यावधि चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज है। दोनों अमेरिकी अधिकारियों ने भारत-अमेरिका संबंधों के भविष्य, ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद, चीन, क्वाड और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर भी अपनी बात रखी।

ट्रेड डील पर जल्द सहमति की उम्मीद
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर मार्को रुबियो ने कहा कि उन्हें ऐसी कोई बड़ी बाधा नजर नहीं आती, जो दोनों देशों को समझौते तक पहुंचने से रोक सके। हालांकि, उन्होंने समझौते की शर्तों और टैरिफ से जुड़ी बारीकियों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। रुबियो ने कहा कि किसी भी समझौते से दोनों देशों को फायदा होना चाहिए और उन्हें उम्मीद है कि इस दिशा में जल्द अच्छी सहमति बन सकती है।

जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत को टैरिफ में स्थिरता मिलेगी और कारोबारियों को बार-बार बदलने वाले शुल्कों की अनिश्चितता से राहत मिलेगी, तो रुबियो ने कहा कि समझौते का उद्देश्य ही व्यापार में स्पष्टता और भरोसा पैदा करना होता है। इससे कंपनियों को निवेश करते समय यह पता रहता है कि उन्हें किन नियमों के तहत कारोबार करना है।


  • 15 साल में 20 अरब डॉलर से 240 अरब डॉलर पहुंचा व्यापार
    भारत में अमेरिकी निवेश के संभावित क्षेत्रों पर सर्जियो गोर ने कहा कि दोनों देशों के बीच कारोबार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। करीब 15 साल पहले भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 20 अरब डॉलर था, जो अब बढ़कर 240 अरब डॉलर हो गया है।

    गोर के मुताबिक, दोनों देशों के बीच निवेश एक-दूसरे की अर्थव्यवस्थाओं में हो रहा है। अमेरिकी कंपनियां भारत में, खासकर आईटी क्षेत्र में, काम कर रही हैं। वहीं, भारतीय कंपनियां भी अमेरिका में बड़े निवेश कर रही हैं। उन्होंने एस्सार ग्रुप का उदाहरण देते हुए बताया कि कंपनी अमेरिका में अरबों डॉलर की सुविधाएं विकसित कर रही है। इससे वहां स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

    गोर ने कहा कि दोनों देशों का लक्ष्य ऐसे निवेश और कारोबारी अवसर बढ़ाना है, जिनसे भारत और अमेरिका दोनों को लाभ मिले। एक देश में किया गया निवेश दूसरे देश में भी रोजगार और कारोबार को बढ़ावा दे सकता है।

    रूसी तेल पर छूट के पीछे वैश्विक ऊर्जा संकट
    भारत की ओर से रूसी तेल की खरीद को लेकर अमेरिकी रुख पर रुबियो से सवाल किया गया। उनसे पूछा गया कि पहले रूसी तेल खरीदने पर भारत को अमेरिकी दबाव और टैरिफ का सामना करना पड़ा, तो अब रूसी डीजल की खरीद और रूसी कच्चे तेल से जुड़े प्रतिबंधों में छूट देने के पीछे क्या वजह है।

    रुबियो ने कहा कि विदेश नीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े फैसलों को किसी एक देश या एक संघर्ष के नजरिये से नहीं देखा जा सकता। अमेरिका रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कराने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इस संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में बने हालात ने ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है।

    रुबियो के अनुसार, ट्रंप ने सीमित समय के लिए वैश्विक बाजार में ऊर्जा की अतिरिक्त आपूर्ति की अनुमति देकर सही फैसला लिया। इससे केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों को भी फायदा हो सकता है, क्योंकि कई देशों में डीजल की कीमतें बढ़ी हुई हैं।

    भारत को ऊर्जा के लिए एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहिए
    रुबियो ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अलग-अलग स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाने की दिशा में पहले से काम कर रहा है। उनके मुताबिक, भारत के हित में है कि वह किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर न रहे।

    उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को केवल रूसी तेल की खरीद घटाने तक सीमित नहीं देखना चाहिए। अमेरिका, वेनेजुएला और पश्चिमी गोलार्ध के दूसरे देशों से तेल की खरीद बढ़ाना भी ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

    रुबियो ने भारत की रिफाइनिंग क्षमता की तारीफ करते हुए कहा कि कच्चे तेल को उपयोगी उत्पादों में बदलने के लिए रिफाइनिंग जरूरी है। भारत के पास इस क्षमता को और बढ़ाने की गुंजाइश है।

    जामनगर रिफाइनरी देखने पहुंचे थे रुबियो
    गुजरात के जामनगर में रिलायंस की रिफाइनरी के दौरे के बारे में रुबियो ने कहा कि उनका उद्देश्य इस बड़ी औद्योगिक सुविधा को करीब से देखना और वहां की कार्यप्रणाली को समझना था। उन्होंने रिफाइनरी को प्रभावशाली सुविधा बताया।

    उन्होंने कहा कि रिलायंस अमेरिका के ब्राउन्सविल में भी एक परियोजना में निवेश कर रही है, जिसके 2029 तक चालू होने की उम्मीद है। रुबियो के मुताबिक, जामनगर का दौरा ऐसी कंपनी से बातचीत का अवसर था, जो भारत के साथ अमेरिका में भी रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने में निवेश कर रही है।

    उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत की रिफाइनिंग क्षमता बढ़ने से पश्चिमी गोलार्ध से आने वाले कच्चे तेल के प्रसंस्करण में मदद मिलेगी। इससे दुनिया की मध्य पूर्व के तेल पर निर्भरता कम करने की कोशिशों को भी बल मिल सकता है।

    भारत में छोटे परमाणु रिएक्टर लगाने की संभावना
    भारत के नागरिक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी निवेश और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (एसएमआर) तकनीक पर रुबियो ने कहा कि इस दिशा में अच्छी प्रगति हो रही है। उन्होंने शांति बिल का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे भारत में एसएमआर और निजी तकनीक के लिए रास्ता खुला है।

    रुबियो ने माना कि नियामकीय प्रक्रियाओं और तकनीकी जटिलताओं के कारण ऐसे समझौतों को पूरा होने में समय लगता है। उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत को उन शुरुआती देशों में शामिल मान रहा है, जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके पहले छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर लगाए जा सकते हैं।

    उनके मुताबिक, इस विषय पर वॉशिंगटन, दिल्ली और मुंबई में बैठकें हुई हैं। दोनों देशों के बीच सहयोग सही दिशा में आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में प्रगति की उम्मीद है।

    पाकिस्तान से संबंध भारत के साथ रिश्तों की कीमत पर नहीं
    मुंबई के ताज होटल में हुए साक्षात्कार के दौरान रुबियो से 26/11 मुंबई आतंकी हमलों का भी जिक्र किया गया। उनसे पूछा गया कि पाकिस्तान के साथ अमेरिका के संबंधों में बढ़ती नजदीकी के बावजूद भारत को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिकी समर्थन का भरोसा कैसे मिल सकता है।

    रुबियो ने कहा कि अमेरिका के वैश्विक हित हैं और उसे दुनिया के कई देशों के साथ संबंध बनाए रखने पड़ते हैं। पाकिस्तान के साथ अमेरिकी रिश्ते नए नहीं हैं। इनका उद्देश्य वहां के फैसलों पर सकारात्मक प्रभाव डालना भी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान के साथ संबंध भारत के साथ अमेरिकी रिश्तों की कीमत पर नहीं हैं।

    रुबियो ने कहा कि अमेरिका आतंकवाद को लेकर भारत की चिंताओं को समझता है, क्योंकि वह खुद भी आतंकवादी हमलों का सामना कर चुका है। उन्होंने आईएसआईएस, अल-कायदा और ओसामा बिन लादेन के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि आतंकवाद से निपटने के लिए अमेरिका लगातार कदम उठाता रहा है।

    ऑपरेशन सिंदूर पर निजी बातचीत का ब्योरा देने से इनकार
    पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव तथा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान रुबियो की कूटनीतिक भूमिका को लेकर भी सवाल पूछे गए। उनसे 10 मई 2025 को हुई बातचीत के पीछे की जानकारी साझा करने को कहा गया।

    रुबियो ने कहा कि वह बातचीत के अंदर की बातें सार्वजनिक नहीं करेंगे, क्योंकि ऐसा करने से भविष्य में दूसरे पक्षों के साथ बातचीत करना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, उन्होंने कहा कि जब दो देशों के बीच तनाव बढ़ता है और बड़े संघर्ष की आशंका पैदा होती है, तब अमेरिका रचनात्मक भूमिका निभाने की कोशिश करता है।

    अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि भारत के साथ अमेरिका के पुराने संबंध हैं और पाकिस्तान के साथ भी उसके रिश्तों में सुधार हुआ है। इन संपर्कों का इस्तेमाल तनाव कम करने और ऐसी स्थिति से बचने के लिए किया जा सकता है, जो बड़े युद्ध में बदल जाए। रुबियो ने कहा कि अमेरिका युद्ध के बजाय कारोबार, साझेदारी और लोगों की सुरक्षा को बढ़ावा देना चाहता है।

    रक्षा सहयोग में बढ़ोतरी, F-35 ने भी किया संयुक्त अभ्यास
    भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी और तकनीक साझा करने के सवाल पर सर्जियो गोर ने कहा कि दोनों देशों के बीच संयुक्त उत्पादन पहले से हो रहा है। उन्होंने लॉकहीड मार्टिन और बोइंग जैसी कंपनियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत और अमेरिका में रक्षा उत्पादन से जुड़े रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं।

    गोर ने कहा कि दोनों देशों का रक्षा सहयोग अपने उच्च स्तर पर है। उनके मुताबिक, पिछले महीने करीब 500 अमेरिकी सैनिकों ने भारत में आयोजित ‘युद्ध अभ्यास’ में हिस्सा लिया था। उन्होंने ‘तरंग शक्ति’ अभ्यास का भी जिक्र किया। गोर के अनुसार, इस अभ्यास में पहली बार अमेरिकी एफ-35 लड़ाकू विमानों ने भारत में भारतीय विमानों के साथ संयुक्त अभ्यास किया।

    उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार बताया और कहा कि क्वाड के तहत भी दोनों देश सहयोग कर रहे हैं। गोर ने संकेत दिया कि अगले महीने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बैठक कराने की दिशा में काम हो रहा है।

    क्वाड के जरिए समुद्री सुरक्षा और सप्लाई चेन पर जोर
    क्वाड और चीन की बढ़ती ताकत के बीच भारत-अमेरिका सहयोग पर रुबियो ने कहा कि विदेश मंत्री बनने के बाद उनकी पहली बैठक क्वाड से जुड़ी थी। उन्होंने दावा किया कि पिछले डेढ़ साल में विदेश मंत्री स्तर पर क्वाड की बैठकें, उससे पहले के चार वर्षों की तुलना में काफी अधिक हुई हैं।

    रुबियो ने उम्मीद जताई कि जल्द ही प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के स्तर पर भी बैठक हो सकती है। उन्होंने समुद्री निगरानी, समुद्र के नीचे मौजूद केबलों की सुरक्षा और सप्लाई चेन को मजबूत करने जैसे क्षेत्रों में सहयोग का उल्लेख किया।

    सर्जियो गोर ने कहा कि भारत और अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्थाओं की महत्वपूर्ण जरूरतों के लिए किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर नहीं रहना चाहते। दोनों देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, तकनीक, बायोमेडिसिन, दवाओं और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में घरेलू क्षमता बढ़ाने के लिए मिलकर काम कर सकते हैं।

    गोर ने कहा कि भारत को ‘पैक्स सिलिका’ पहल में शामिल करने के पीछे दोनों देशों के बीच भरोसा एक अहम कारण है। उन्होंने बताया कि अमेरिका के अटॉर्नी जनरल, ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन के प्रमुख और दूसरे वरिष्ठ अधिकारी भी भारत के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए आने वाले हैं।

    भारतीय पेशेवरों के वीजा नियमों पर क्या है अमेरिका का रुख?
    अमेरिका में कुशल भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए वीजा महंगा होने से जुड़े सवाल पर रुबियो ने कहा कि ये बदलाव भारत को निशाना बनाकर नहीं किए गए हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी इमिग्रेशन व्यवस्था में लंबे समय से समस्याएं रही हैं। कुछ कारोबारी वीजा कार्यक्रमों में धोखाधड़ी और दुरुपयोग की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।

    रुबियो के मुताबिक, अमेरिका अपनी इमिग्रेशन व्यवस्था में बदलाव कर रहा है, ताकि वह अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वहां के नागरिकों के हित में काम करे। उन्होंने माना कि जिन देशों के नागरिक इन बदलावों से ज्यादा प्रभावित होते हैं, उन्हें लग सकता है कि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। हालांकि, उनके अनुसार ये नियम दुनिया के सभी देशों पर लागू होते हैं।

    रुबियो ने कहा कि भारत सरकार से भी अपेक्षा है कि वह अपने नागरिकों और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे। इसी तरह ट्रंप प्रशासन अमेरिकी नागरिकों, कर्मचारियों और देश के हितों को सबसे पहले रखेगा।

    इस मुद्दे पर सर्जियो गोर ने कहा कि ‘अमेरिका फर्स्ट’ का अर्थ ‘अमेरिका अलोन’ यानी अमेरिका का अकेले चलना नहीं है। उनके मुताबिक, भारत का ‘इंडिया फर्स्ट’ दृष्टिकोण भी स्वाभाविक है। दोनों देशों को अपने मतभेदों के बावजूद सहयोग के रास्ते तलाशने चाहिए।

    रूस-यूक्रेन युद्ध का सैन्य नहीं, कूटनीतिक समाधान जरूरी
    रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की ओर से अमेरिका, रूस और यूक्रेन के बीच त्रिपक्षीय बैठक की संभावना पर रुबियो ने कहा कि युद्ध खत्म करना कठिन है, लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर आना होगा।

    उन्होंने कहा कि संघर्ष के केंद्र में डोनबास क्षेत्र को लेकर विवाद है। रूस इस क्षेत्र पर नियंत्रण चाहता है, जबकि यूक्रेन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के कारण इसे छोड़ना नहीं चाहता। रुबियो के अनुसार, यह युद्ध सैन्य तरीके से खत्म नहीं होगा, बल्कि इसके लिए कूटनीतिक समाधान तलाशना जरूरी है।

    उन्होंने कहा कि युद्ध समाप्त करने वाले समझौते तक पहुंचने के लिए दोनों पक्षों को कुछ रियायतें देनी पड़ सकती हैं। अमेरिका दोनों पक्षों को बातचीत के लिए साथ लाने में मदद करना चाहता है। हालांकि, रुबियो ने यह भी माना कि केवल बैठक हो जाने से समाधान की गारंटी नहीं मिलती।

    मोदी और ट्रंप अच्छे दोस्त, इस महीने कई बार हुई बात
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रिश्तों पर सर्जियो गोर ने कहा कि दोनों नेता अच्छे दोस्त हैं। उनकी सोच काम आगे बढ़ाने और नतीजे हासिल करने को लेकर एक जैसी है। गोर ने ट्रंप को स्पष्ट बोलने वाला और परिणामों पर ध्यान देने वाला नेता बताया। उन्होंने कहा कि ट्रंप तेजी से काम करना और फैसलों को लागू होते देखना चाहते हैं।

    गोर के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच इस महीने कई बार फोन पर बातचीत हुई है। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं के बीच बहुत सी बातें पर्दे के पीछे भी होती हैं, जिनकी जानकारी आम लोगों को नहीं होती। गोर ने दावा किया कि ट्रंप प्रधानमंत्री मोदी का बहुत सम्मान करते हैं और दोनों नेताओं के बीच बातचीत आगे भी जारी रहेगी।

    रुबियो ने ट्रंप को बताया ऐतिहासिक शख्सियत
    राष्ट्रपति ट्रंप के साथ काम करने के अनुभव के बारे में पूछे जाने पर मार्को रुबियो ने उन्हें ऐतिहासिक शख्सियत बताया। उन्होंने कहा कि ट्रंप पारंपरिक राजनेताओं की तरह नहीं सोचते, बल्कि कारोबारी नजरिये से फैसले लेते हैं। वह ऐसे विचारों पर भी काम करते हैं, जिन्हें दूसरे लोग असंभव मानते हैं।

    रुबियो के मुताबिक, ट्रंप के साथ काम करने वालों को यह भरोसा मिलता है कि वे ऐसे काम कर सकते हैं, जो पारंपरिक राजनीतिक नेतृत्व के तहत शायद संभव नहीं होते। सर्जियो गोर ने भी कहा कि भविष्य में ट्रंप के कार्यकाल को ऐतिहासिक फैसलों और उपलब्धियों के लिए याद किया जाएगा।

    2028 में राष्ट्रपति चुनाव लड़ेंगे रुबियो?
    मार्को रुबियो से जब पूछा गया कि क्या वह 2028 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बनेंगे, तो उन्होंने इस विषय पर आगे बात करने से इनकार कर दिया। रुबियो ने कहा कि वह अमेरिकी मीडिया को इस सवाल का जवाब पहले भी कई बार दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि फिलहाल उनके पास दो जिम्मेदारियां हैं, जिनमें उनका पूरा समय और ऊर्जा लग रही है। अभी उनका ध्यान उन्हीं जिम्मेदारियों को निभाने पर है।

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