
एक घर (Home) में आग (Fire) नहीं लगी… आठ लोगों की मौत ही नहीं हुई… आग दिल में भी लगी है… इस शहर (Indore) के विश्वास की भी मौत हुई है… वह मंजर दिल को रौंद जाता है, जब रात के अंधकार में आग की लपटों में घिरा चीखता, चिल्लाता, झुलसता परिवार… बच्चों का रुदन, बड़ों की चीत्कार… चीखों की आवाज… बेबसी का ऐसा आलम जहां लोग जुटते जा रहे थे… भीड़ बढ़ती जा रही थी, लेकिन कुंभकर्णी नींद में सोए फायर ब्रिगेड के जिम्मेदार सूनी सडक़ें लांघकर भी एक घंटे बाद तब पहुंचे, जब वहां मासूम बच्चे लाश बन चुके थे… रोते, चीखते, बिलखते लोगों की आवाजें थम गई थीं… मौत का दावानल पसर चुका था… जिंदा इंसान लाशों में बदल चुके थे… विकास और आधुनिकता के तिलस्म में डूबे इस शहर में लापरवाह मौतों का एक पन्ना उस समय और जुड़ गया, जब बचाने वालों की नींद ने एक परिवार को ऐसी यातनाभरी मौत की नींद सुला दिया, जिसके बारे में सोचकर ही दिल दहल उठे… घटना के बाद वहां नेता पहुंचे, मंत्री पहुंचे, अधिकारियों का भी तांता लगा, लेकिन किसी ने भी इस सवाल का जवाब नहीं ढूंढा कि फायर ब्रिगेड के दमकलकर्मी घटना के एक घंटे बाद क्यों पहुंचे, जबकि आग की चिंगारी के विकराल होते ही फटते गैस सिलेंडरों से पूरा इलाका जाग चुका था… लोग थर्रा उठे थे… फंसे लोगों को बचाने के लिए तमाम कोशिशें करते लोगों ने दरवाजे तोडऩे के लिए पत्थर फेंके, फायर ब्रिगेड को फोन खडख़ड़ाए, लेकिन वो समय पर नहीं आए… सन्नाटेभरी सडक़ों पर भी उनके पहिए दौड़ नहीं लगा पाए… शहर का प्रशासन लोगों से टैक्स की वसूली के लिए ढेरों हथकंडे अपनाता है… आधी रात को दौड़ा चला आता है… लोगों की सम्पत्ति पर ताला लगाता है… पुल बनाने, ब्रिज बनाने, सडक़ें बनाने की योजना बनाता है… लेकिन जान बचाने वाली दमकलों को जगा नहीं पाता… इस शहर के लोगों को अफसोस नहीं आक्रोश होना चाहिए… दिल में लगी आग से जिम्मेदारों को झुलसना चाहिए… वो समय पर क्यों नहीं पहुंचे इसका जवाब मिलना चाहिए… बढ़ते शहर में अब एक स्थान पर दमकल का दफ्तर रखने के बजाय हर झोन पर दमकल की गाड़ी और अमला होना चाहिए…गंदे पानी की मौतों के बाद आग से हुई लापरवाह मौतों से भी सबक सीखना चाहिए… वसूली करने में डूबे नेताओं और अधिकारियों को सबक सीखना चाहिए… जो चले गए उनकी चीखों से तो इस शहर और इस शहर के जिम्मेदारों को जागना चाहिए…
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