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अहमदाबाद में 200 साल पुरानी अनोखी परंपरा, नवरात्रि की आठवीं रात साड़ी पहनकर गरबा करते हैं पुरुष

October 19, 2026

नई दिल्ली ।गुजरात (Gujarat) में नवरात्रि (Navratri) का त्योहार गरबा (Garba), देवी आराधना और पारंपरिक उत्सवों के लिए जाना जाता है। इस दौरान अहमदाबाद (Ahmedabad) के शाहपुर (Shahpur) इलाके में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो अपने अनूठे स्वरूप के कारण खास पहचान रखती है। यहां नवरात्रि की आठवीं रात बारोट समुदाय के पुरुष साड़ी पहनकर और माथे पर सिंदूर की बिंदी लगाकर गरबा करते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, करीब 200 साल से चली आ रही यह परंपरा साडू माता (Sadu Mata) के बलिदान, समुदाय के पछतावे और प्रायश्चित की कहानी से जुड़ी है।

शाहपुर की साडू माता नी पोल में हर साल इस आयोजन के लिए लोग एकत्र होते हैं। पुरुष पारंपरिक रूप से साड़ी पहनकर देवी के सम्मान में गरबा करते हैं। इस रस्म में बारोट समुदाय के सदस्यों के अलावा दूसरे समुदायों के लोग भी हिस्सा लेते हैं। वर्ष 2026 में भी इस परंपरा का आयोजन किया गया, जिसमें कम से कम 40 पुरुष शामिल हुए। इनमें मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग भी थे। समुदाय के वरिष्ठ सदस्य सतीश बारोट, जिनकी उम्र 60 वर्ष है, ने बताया कि वह चार दशक से अधिक समय से इस रस्म में भाग लेते आ रहे हैं।

इस बार आयोजन में सुरेंद्रनगर से आए पिंटू बारोट ने भी अपने परिवार के साथ हिस्सा लिया। उनके 10 वर्षीय बेटे, भाई और भतीजे ने पहली बार इस परंपरा में भागीदारी की। इस तरह यह आयोजन केवल पुरानी मान्यता को निभाने तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी तक इसके इतिहास और सांस्कृतिक महत्व को पहुंचाने का माध्यम भी बना हुआ है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस परंपरा की जड़ें लगभग दो शताब्दी पहले की एक घटना में हैं। लोककथा के अनुसार, बारोट समुदाय की साडू माता अपनी सुंदरता के लिए जानी जाती थीं। उस समय के शासक ने उन्हें दरबार में पेश करने का आदेश दिया था। इसके लिए सैनिकों का एक दल भेजा गया। समुदाय के लोगों ने साडू माता को उनकी इच्छा के विरुद्ध दरबार ले जाने का विरोध किया। इससे सैनिकों और समुदाय के सदस्यों के बीच टकराव की स्थिति बन गई।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, हालात बिगड़ने पर साडू माता ने पहले अपनी बेटी अजूबा की जान ले ली। इसके बाद उन्होंने अपने पति हाथीसिंह बारोट से कहा कि उन्हें शाही दरबार में ले जाने देने के बजाय तलवार के एक वार से उनकी जान ले लें। इस तरह साडू माता की मृत्यु हो गई। समुदाय की लोकस्मृति में इस घटना को बलिदान के रूप में याद किया जाता है। हालांकि, यह विवरण स्थानीय मान्यता और प्रचलित लोककथा पर आधारित है।

कहानी के अगले हिस्से में समुदाय के पछतावे का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि साडू माता की रक्षा नहीं कर पाने के कारण समुदाय के लोगों को गहरा दुख हुआ। इसके बाद परिवारों में पुरुषों की मृत्यु और वंश आगे बढ़ने में कठिनाइयों को साडू माता के कथित श्राप से जोड़कर देखा जाने लगा। इन घटनाओं को लेकर समुदाय के लोगों ने उनके स्मारक पर एकत्र होकर प्रायश्चित किया और परिवारों की खुशहाली तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रार्थना की।

लोकविश्वास के अनुसार, इसी प्रायश्चित के दौरान पुरुषों ने साड़ी पहनने का संकल्प लिया। समुदाय के लोग मानते हैं कि प्रार्थनाओं के बाद उनके परिवारों की वंश-परंपरा आगे बढ़ने लगी। धीरे-धीरे साड़ी पहनकर गरबा करने की रस्म नवरात्रि की आठवीं रात का स्थायी हिस्सा बन गई।


  • आज इस परंपरा को समुदाय के लोग आस्था, भक्ति, कृतज्ञता और सामूहिक स्मृति से जोड़कर देखते हैं। अहमदाबाद के शाहपुर में होने वाला यह आयोजन गुजरात की सांस्कृतिक विविधता का एक विशिष्ट उदाहरण है, जहां नवरात्रि का उत्सव देवी आराधना के साथ पीढ़ियों से चली आ रही लोकमान्यताओं को भी जीवित रखता है।

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