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अनोखी परंपरा या मजबूरी? शख्स ने जीते-जी किया भंडारा, सुनकर भर आएंगी आंखें

March 30, 2026

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश(Uttar Pradesh) के औरैया जिले (Auraiya district)से एक बेहद भावुक और सोचने पर मजबूर कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां लक्ष्मणपुर गांव(Laxmanpur village) के 65 वर्षीय राकेश यादव(Rakesh Yadav) ने जीते-जी अपनी ही तेरहवीं करने का फैसला लिया है। उन्होंने सोमवार को 1900 लोगों के लिए भंडारे का आयोजन किया है और गांव-गांव जाकर लोगों को न्योता भी दिया है। इस अनोखे फैसले के पीछे छिपी वजह किसी का भी दिल पिघला सकती है।

अकेलेपन ने लिया बड़ा फैसला

राकेश यादव तीन भाइयों में सबसे बड़े हैं, लेकिन आज उनके साथ कोई नहीं है। उनके एक भाई चंद्रपाल यादव की बीमारी से मौत हो चुकी है, जबकि दूसरे भाई नरेश यादव की हत्या कर दी गई थी। तीनों भाइयों की शादी नहीं हुई थी। परिवार में लगातार हुए इन दुखद घटनाओं ने राकेश को पूरी तरह अकेला कर दिया।

उनकी एक बहन है, लेकिन वह अपने परिवार में व्यस्त हैं। ऐसे में राकेश को यह डर सताने लगा कि उनके निधन के बाद उनका अंतिम संस्कार या तेरहवीं करने वाला कोई नहीं होगा। यही चिंता उनके इस फैसले की सबसे बड़ी वजह बनी।

‘मरने के बाद कौन करेगा संस्कार?’

राकेश यादव का कहना है कि उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें किसी पर भरोसा नहीं है। रिश्तेदार हैं, लेकिन उन्हें यकीन नहीं कि वे उनके जाने के बाद उनकी तेरहवीं या अंतिम संस्कार करेंगे। यही सोचकर उन्होंने जीते-जी यह आयोजन करने का निर्णय लिया, ताकि उनके जीवन में एक बार उनके नाम का भोज हो और गांव के लोग उसमें शामिल हों।

1900 लोगों को न्योता, खुद के लिए आखिरी भोज

राकेश ने करीब 1900 लोगों को इस भंडारे में आमंत्रित किया है। खास बात यह है कि यह आयोजन सिर्फ भोज तक सीमित रहेगा, इसमें पिंडदान जैसे धार्मिक कर्मकांड नहीं किए जाएंगे। गांव में इस खबर के बाद चर्चा का माहौल है। कोई इसे उनकी मजबूरी बता रहा है तो कोई इसे उनके गहरे अकेलेपन का दर्द।

मेहनत की कमाई से कर रहे आयोजन

राकेश यादव फिलहाल एक साधारण मड़ैया में रहते हैं और उन्हें वृद्धावस्था पेंशन मिलती है। उन्होंने सालों की मेहनत-मजदूरी से जो पैसा जोड़ा, उसी से इस भंडारे का आयोजन कर रहे हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने अपना पैतृक घर भी एक रिश्तेदार को दान कर दिया है।

  • समाज के लिए एक सवाल

    यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि समाज के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा करती है कि आखिर क्यों एक इंसान को अपने जीते-जी अपनी तेरहवीं करनी पड़ रही है। यह कहानी अकेलेपन, असुरक्षा और रिश्तों में घटते भरोसे की सच्चाई को उजागर करती है।

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