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महाशिवरात्रि पर उमड़ा आस्था का सैलाब एशिया के सबसे ऊंचे शिव मंदिर जटोली की अलौकिक गाथा

February 15, 2026

नई दिल्‍ली । आज देशभर में धूमधाम से महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जा रहा है. भारत में भगवान शिव के कई प्रमुख मंदिर हैं. लेकिन हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित जटोली शिव मंदिर की महिमा खास है. सोलन के जटोली शिव मंदिर को लेकर दावा किया जाता है कि यह एशिया का सबसे ऊंचा और भव्य शिव मंदिर है. मान्यता है कि यहां भगवान शिव ने तपस्या की थी. इसलिए यह स्थल विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा से जुड़ा हुआ है. महाशिवरात्रि पर यहां हजारों श्रद्धालु जलाभिषेक और पूजा के लिए पहुंचते हैं. ऊंची शिखर शैली में बना यह भव्य मंदिर आस्था और दिव्यता का अद्भुत प्रतीक है. यहां दर्शन मात्र से इंसान के जीवन की दशा बदल जाती है.

भगवान शिव के इस मंदिर में स्फटिक मणि का शिवलिंग स्थापित है. मंदिर का निर्माण दक्षिण-द्रविड़ शैली में किया गया है. यह मंदिर अपनी अनूठी वास्तु कला और शांत वातावरण के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है. लगभग 122 फुट ऊंचे इस मंदिर का निर्माण दक्षिण-द्रविड़ शैली में किया गया है. मंदिर का निर्माण कार्य 1974 में शुरू हुआ और इसे बनने में लगभग 39 साल लगे.

यह मंदिर दक्षिण-द्रविड़ शैली में बना है, जिसमें तीन पिरामिड नुमा संरचनाएं हैं. इस रहस्यमयी शिव मंदिर को लेकर ये भी मान्यता है कि पौराणिक काल में भोलेनाथ कुछ समय के लिए यहां रहने आए थे. यहां हर साल महाशिवरात्रि का पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है. यह स्थान न केवल एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है, बल्कि यह अपने शांत वातावरण और सुंदर दृश्यों के लिए भी प्रसिद्ध है, जो श्रद्धालुओं को शिव की भक्ति में लीन करता है.
महाशिवरात्रि की कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था. इस दिन भगवान शिव के भक्त उपवास रखकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं. श्रद्धा से की गई पूजा से शिव-पार्वती की कृपा मिलती है, जिससे लोगों के वैवाहिक जीवन में खुशियों का संचार होता हैय


  • एक अन्य कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है. जब देवता और असुर अमृत की प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन कर रहे थे, तब सबसे पहले अत्यंत घातक हलाहल विष प्रकट हुआ, जिससे संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई. संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव विष निगल गए और उसे कंठ में ही रोक लिया. फलस्वरूप शिवजी का गला नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए. उस रात देवताओं ने जागकर महादेव की आराधना की. कहा जाता है कि महाशिवरात्रि का रात्रि जागरण उसी घटना की स्मृति में किया जाता है.

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